अध्ययन में ये तथ्य आए सामने
हिमालय के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में गर्मियों के दौरान जमीन की ऊपरी परत पिघलती है और सर्दियों में दोबारा जम जाती है। वैज्ञानिक इसे सक्रिय परत कहते हैं। इसकी गहराई में होने वाला बदलाव तापमान और मौसम में परिवर्तन के हिमालयी जमीन पर पड़ने वाले प्रभाव को समझने का महत्वपूर्ण संकेत है। अध्ययन के अनुसार, सैटेलाइट आंकड़ों में मटियान में सक्रिय परत की मोटाई करीब एक से तीन मीटर और बारालाचा में 0.5 से दो मीटर तक आंकी गई। इन आंकड़ों की जांच के लिए ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार (जीपीआर) का इस्तेमाल किया गया। यह तकनीक जमीन के भीतर रेडियो तरंगें भेजकर विभिन्न परतों की स्थिति का पता लगाती है। जमीन पर हुई जीपीआर जांच में मटियान में पिघलने वाली परत की गहराई 0.6 से 1.2 मीटर और बारालाचा में 0.2 से 0.5 मीटर मिली।
निगरानी के लिए सैटेलाइट तकनीक की उपयोगिता सामने आई
बारालाचा में यह परत कम गहरी पाई गई। शोधकर्ताओं के अनुसार, अधिक ऊंचाई और अपेक्षाकृत कम तापमान इसका प्रमुख कारण हो सकता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, इस बदलाव को समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि सक्रिय परत के नीचे लंबे समय से जमी जमीन होती है। तापमान बढ़ने से इसके पिघलने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इसका असर पानी के प्रवाह, वनस्पति, जमीन की मजबूती और कार्बन के प्राकृतिक चक्र पर पड़ सकता है। साथ ही, ये बदलाव हिमालयी क्षेत्रों में भूस्खलन और अन्य भू-तकनीकी जोखिमों को समझने में भी महत्वपूर्ण हैं। सैटेलाइट और जीपीआर जांच के परिणामों में मजबूत समानता मिली है। इससे दूरदराज के हिमालयी क्षेत्रों में जमीन के भीतर होने वाले मौसमी बदलावों की निगरानी के लिए सैटेलाइट तकनीक की उपयोगिता सामने आई है।
हिमालय में जमीन की ऊपरी परत गर्मियों में कितनी गहराई तक पिघलती है, यह वहां के बदलते तापमान और पर्यावरणीय परिस्थितियों का महत्वपूर्ण संकेत है। सैटेलाइट और जमीन पर की गई जांच के नतीजों में समानता से दूरदराज के हिमालयी क्षेत्रों में होने वाले बदलावों पर लगातार नजर रखने की उम्मीद बढ़ी है। -प्रो. डेरिक्स प्रेज शुक्ला, प्रोफेसर, आईआईटी मंडी