सड़क टूटी, पैदल रास्ता भी नहीं बचा, पीठ पर राशन और खाने-पीने का सामान ला रहे लोग
ग्रामीण बोले- सिलिंडर लाना भी बड़ी चुनौती, खाई में उतरने से हो सकता है जान का जोखिम
कहा- घाटी के कई गांवों में खत्म होने वाला है खाने-पीने की वस्तुओं का संकट
संवाद न्यूज एजेंसी
कुल्लू। लगघाटी में अब सड़क नहीं, सिर्फ संघर्ष की पगडंडियां बची हैं। पीठ पर सिलिंडर, हाथ में राशन की थैलियां और पैरों के नीचे फिसलती मिट्टी ही लोगों के लिए रोजमर्रा की बात हो गई है।
चौपाड़सा से डुंखरीगाहर तक चार पंचायतों के लोग न सड़क के भरोसे हैं और न ही सरकार के। बस, खुद के हौसले के सहारे जिंदगी ढो रहे हैं। लोग खाई में उतरकर जान जोखिम में डालकर रोजमर्रा का सामान घर तक पहुंचा रहे हैं। घाटी के लोगों की मानें तो अब कई गांवों में खाने-पीने की वस्तुओं का संकट खड़ा होने वाला है। घाटी की चार पंचायतों का संपर्क कट चुका है। पैदल रास्ते भी नहीं बचे हैं जहां से रोजमर्रा का सामान ले जा सकें। घाटी की चौपाड़सा, फलाण, मानगढ़, डुंखरीगाहर पंचायतों के लोगों के सामने मुसीबतें खड़ी हो गई हैं।
चौपाड़सा पंचायत की पूर्व प्रधान विमला ठाकुर ने कहा कि लोगों को राशन और खाने-पीने का सामान व सिलिंडर गांव तक पहुंचाना मुश्किल हो रहा है। सड़क जगह-जगह टूट गई है। पैदल रास्ता भी नहीं बचा है। लोग खाई में उतरकर खाने-पीने और जरूरत का सामान घर तक पहुंचा रहे हैं। उन्होंने प्रशासन और सरकार से आग्रह किया है कि सबसे पहले पैदल चलने के मार्ग को ठीक किया जाए जिससे लोग पैदल जरूरत का सामान घरों तक पहुंचा सकें।
लावारिस छोड़ा, कोई हादसा हुआ तो जिम्मेदार कौन
घाटी के यशपाल ठाकुर ने कहा कि लगघाटी को इस समय लावारिस छोड़ दिया गया है। लोग जान जोखिम में डालकर सामान ला रहे हैं। वे कभी भी हादसे का शिकार हो सकते हैं। अगर घाटी के लोगों के साथ हादसा होता है तो इसके लिए जिम्मेदार कौन होगा? कई जगह लोग नेपाल के मजदूर लगाकर भी सामान ला रहे हैं। उन्होंने सरकार से मांग की है कि घाटी की इस विकट परिस्थिति में लोगों की मदद की जाए और रास्तों को ठीक किया जाए।