धुंधली तस्वीर और भ्रामक विश्लेषणों के बीच असमंजस में कुल्लू के बागवान
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में आयात शुल्क को 25 प्रतिशत की कटौती
संजय ठाकुर
पतलीकूहल (कुल्लू)। भारत की ओर से न्यूजीलैंड, यूरोपियन संघ और अमेरिका जैसे देशों के साथ किए गए व्यापार समझौतों के तहत सीमित मात्रा में सेब आयात को लेकर दी गईं रियायतों की खबर ने कुल्लू घाटी के बागवानों के बीच हलचल पैदा कर दी है।
हालांकि समझौते की स्पष्ट तस्वीर पूरी तरह से सामने नहीं आई है लेकिन इन समझौतों को लेकर स्थानीय स्तर पर राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है और बागवानों को भी उलझा दिया है। नतीजतन, बागवान असली स्थिति समझने के बजाय अफवाहों और राजनीतिक बयानबाजी के बीच फंसते नजर आ रहे हैं।
घाटी की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा सेब उत्पादन है। 75 हजार परिवार परिवार सीधे तौर पर बागवानी से जुड़े हैं जबकि हजारों आढ़ती, पैकिंग, ढुलाई और मजदूरी से जुड़े लोग भी इसी पर निर्भर हैं। भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तहत सेब के आयात शुल्क में 50 से घटाकर 25 प्रतिशत की गई कटौती से बागवानों के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं। बावजूद इसके स्पष्ट जानकारी बागवानों तक नहीं पहुंचने से परेशान हैं।
कई प्रगतिशील बागवानों राम लाल, सुरेश, जितेंद्र, कमल, सोहन लाल, कर्मवीर और सुरेंद्र का कहना है कि उन्हें डर से ज्यादा असमंजस परेशान कर रहा है। अगर आयात सीमित है तो कितना और किस अवधि तक। इन सवालों के ठोस जवाब न मिलने से स्थिति धुंधली बनी हुई है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि प्रतिस्पर्धा आती भी है तो कुल्लू के सेब की अपनी अलग पहचान है। स्वाद, रंग, ऊंचाई पर उत्पादन और पारंपरिक गुणवत्ता इसकी ताकत है। जरूरत है कि ग्रेडिंग, पैकेजिंग, नियंत्रित भंडारण और ब्रांडिंग को और मजबूत किया जाए। यदि विपणन व्यवस्था सशक्त हो और बिचौलिया तंत्र पारदर्शी बने तो बाहरी सेब से सीधी टक्कर का खतरा उतना गंभीर नहीं होगा, जितना प्रचारित किया जा रहा है।
कुल्लू फलोत्पादक मंडल के अध्यक्ष प्रेम शर्मा ने कहा कि इस संवेदनशील मुद्दे पर राजनीति से अधिक नीति की जरूरत है। केंद्र और राज्य सरकार को स्पष्ट तथ्य सामने रखने चाहिए, आयात की शर्तों और सीमाओं की जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए और स्थानीय किसानों से संवाद स्थापित करना चाहिए।