जिले में सेब की नई प्रजातियों के पौधे लगाने में बढ़ा बागवानों का क्रेज
धाटी में प्लम और जापानी फल के भी तैयार किए जा रहे हैं नए बगीचे
संवाद न्यूज एजेंसी
मनाली। कुल्लू-मनाली की पहचान रहे रॉयल डिलीशियस सेब की चमक अब धीरे-धीरे फीकी पड़ रही है। बदलते मौसम, घटते चिलिंग ऑवर्स और बाजार में जल्दी और बेहतर दाम दिलाने वाली नई किस्मों ने बागवानों की रणनीति बदल दी है।
अब पारंपरिक लालिमा की जगह गाला, स्पर और अन्य हाई-यील्ड प्रजातियां ले रही हैं। यही नहीं, प्लम और जापानी फल के नए बगीचे भी तैयार हो रहे हैं जिससे पहाड़ की बागवानी अर्थव्यवस्था एक नए दौर में प्रवेश करती दिख रही है। गोल्डन सेब का स्वाद भी अब ढूंढने को रह गया है।
जिले में लगभग 25,000 हेक्टेयर से अधिक भूमि पर सेब की खेती की जाती है। यह क्षेत्र हिमाचल के प्रमुख सेब उत्पादक क्षेत्रों में से एक है। सेब अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। पारंपरिक रॉयल, रेड और गोल्डन डिलीशियस सेब की जगह अब गाला सेब की किस्में ले रही हैं।
गाला सेब और स्पर प्रजाति के सेब की खासियत यह है कि इसकी कम ऊंचाई और गर्म होते तापमान में भी अच्छी पैदावार होती है। जल्दी फल देने और आकर्षक रंग-स्वाद के कारण बागवान इसे पसंद कर रहे हैं। गाला सेब अधिक कुरकुरे, रसीले और मीठे होते हैं। जापानी फल के पौधों की मांग में भी इजाफा हुआ है। वर्षों से सेब के पौधों को नर्सरी में तैयार के बेचने वाले डोभी के संगत राम ने बताया कि गाला, स्पर, किंग रोट, रेडलम गाला, डार्क ब्राउन गला टी-रेक्स प्रजाति के सेब के पौधों की मांग सबसे ज्यादा है। स्थानीय बागवानों के अलावा जम्मू-कश्मीर, शिमला और उत्तराखंड को भी इसकी सप्लाई हो रही है। लरांकेलो के केवल राम ने बताया कि प्लम और जापानी फल के बगीचे भी बागवान तैयार कर रहे है। गाला प्रजाति के सेब और पलम, जापानी फल की ज्यादा मांग है। राॅयल डिलीशियस सेब के पौधों की मांग में भाई कमी आई है।
गर्म इलाकों में भी भरपूर पैदावार
पारंपरिक रॉयल डिलीशियस 1400 घंटे से अधिक चिलिंग ऑवर्स की जरूरत रहती है। गाला सेब कम ठंडे क्षेत्रों में भी अच्छी फसल देते हैं। गाला के पौधे रोपण के लगभग तीन साल के भीतर ही फल देना शुरू कर देते हैं। राॅयल जुलाई के अंतिम सप्ताह तक तैयार होता है जबकि गाला जुलाई में बाजार में पहुंचना शुरू हो जाता है। ऐसे में इससे बागावानों को अच्छे दाम मिल जाते हैं। यह किस्म अन्य पारंपरिक किस्मों की तुलना में बीमारियों के प्रति कम संवेदनशील है।
राॅयल और गोल्डन की मांग अब कम हो गई है। गाला सेल्फ पॉलीनाइजर पौधा है। ऐसे में यह गोल्डन का विकल्प बन गया है। गोल्डन सेब की प्रजाति अब बहुत कम हो गई है। जिले में लगभग 20 प्रतिशत सेब अब इसी प्रजाति का हो रहा है। नए बगीचे भी इसी के लगाए जा रहे हैं।
-राजकुमार उप निदेशक बागवानी विभाग