जिले के मंदिरों में गूंज रहे हैं देवगीत
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धार्मिक नगरी मणिकर्ण की महिलाएं देव तपस्या में लीन हो गईं हैं। महिलाओं की तपस्या एक माह तक चलेगी। वहीं तपस्या में लीन होने के साथ घाटी की महिलाओं पर एक माह तक घर से बाहर निकलने पर देव प्रतिबंध लग गया है। मंदिरों में पारंपरिक देव गीतों का आगाज हो गया है। देवगीतों की रिवायत को महिलाएं निभाती हैं। गौरतलब है कि मणिकर्ण घाटी के देवालय चैत्र माह की संक्रांति से देव गीतों से गूंज रहे हैं।
हर शाम को गांवों की महिलाएं एकत्रित होकर दो-तीन घंटे तक देव गीतों की परंपरा को निभा रही हैं। मान्यता है कि चैत्र माह का महीना देवी-देवताओं ने महिलाओं को उनकी तपस्या करने के लिए दिया है। इस महीने में देवी-देवता के गीत गाए जाते हैं। वहीं फूलों के साथ देवी-देवताओं का अटूट संबंध है। इस माह फूल खिलने शुरू हो गए हैं। ऐसे में महिलाएं देव गीतों के साथ-साथ देवी-देवताओं को खुश करने के लिए विभिन्न पेड़-पौधों के फूलों के गीतों को भी संजो रही हैं। देव तपस्या के चलते महिलाओं पर घर से बाहर निकलने पर देव प्रतिबंध रहता है। यह देव प्रतिबंध बैसाख माह की संक्रांति के दिन हटेगा।
मणिकर्ण घाटी के डढेई, चनालदी, शराणीबेहड़, बुहाड़ और जां सहित कई मंदिरों में देव गीतों की धूम चली हैं। महिलाएं शाम छह बजे से देव करीब तीन घंटे तक देव गीतों को गाती हैं। कहीं देव गीतों का नाम शराणी है तो कहीं गुणे और रीता है। देव गीतों को गाने के बाद महिलाएं कुल्लवी नाटी भी हर शाम को प्रस्तुत करती हैं। माता कैलाशना के कारदार हुकम राम का कहना है कि एक माह तक महिलाएं देव तपस्या करेंगी। देव गीतों का गाकर देव शक्तियों को और बढ़ावा देंगी। बैसाख संक्रांति को देव गीत खत्म होंगे। इसके बाद महिलाओं के लिए देवी-देवताओं की ओर से एक देव प्रीतिभोज का आयोजन किया जाएगा।