उदयपुर (लाहौल-स्पीति)। लाहौल की वादियों में इन दिनों अगर कहीं स्वर्ग उतरा है तो वह है गुंचलिंग! ऐसा लग रहा था कि मानो देवता स्वर्ग से धरती पर उतर आए हों। केसमदोर के इस पावन अवसर पर गुंचलिंग देवलोक का एहसास दिला रहा था। मंगलवार की देर शाम जब ठंडी हवाओं के बीच आठ देवी-देवताओं के रथों ने गुंचलिंग की पावन धरती पर प्रवेश किया तो पूरा क्षेत्र जयकारों से गूंज उठा। मेले में गोंदला के रक्षक देव मिलंग तेते, ट्रिलिंग की अधिष्ठात्री देवी शलबर, खंगसर के नाग देवता, शुगू के देव लुंखर बल, रालिंग के देव ड्राबला, शूलिंग की देवी मोगर, रोपसंग की देवी बोटी और समूची लाहौल घाटी के राजा अधिष्ठाता राजा घेपन ने एक साथ शिरकत की। इन आठ देवी-देवताओं के मिलन को देखने के लिए घाटी भर से श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। ढोल-नगाड़ों की थाप, रणसिंघों की गूंज और पुजारियों के मंत्रोच्चारण के बीच आठों देवी-देवता एक-दूसरे से गले मिले। ऐसा दिव्य नजारा था कि लगा ही नहीं ये धरती है, ये तो साक्षात देव लोक है। अपने गूर के माध्यम से राजा घेपन और देवी बोटी ने घाटी परिक्रमा पर आगे बढ़ने की इच्छा जाहिर की और हाथ उठाकर पूरी लाहौल घाटी को सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद दिया।
घाटी के अधिष्ठाता राजा घेपन और देवी बोटी की यह पवित्र लाहौल परिक्रमा हर दो साल बाद होती है। दो साल के इंतजार के बाद जब राजा अपनी प्रजा का हाल जानने निकलते हैं, तब ही केसमदोर जैसे अलौकिक मेले का आयोजन होता है। आज गुंचलिंग में इस दिव्य मेले का समापन हो गया है और समापन के साथ ही राजा घेपन की देवी बोटी के साथ पवित्र रथ यात्रा शुरू हो गई है। वीरवार रात ट्रिलिंग गांव में भव्य जागरा उत्सव की परंपरा का निर्वहन किया गया। इसमें सभी देवी-देवताओं ने भाग लिया। शुक्रवार सुबह राजा घेपन और देवी बोटी मूलिंग गांव की ओर प्रस्थान करेंगे।