कुल्लू। रंगमंच से फिल्मों में गया कलाकार मात नहीं खाता है। रंगमंच हमेशा मूल में ही रहता है और यह सिलसिला स्कूल या कॉलेजों के युवा उत्सवों से आरंभ होता है। नाट्य दलों से होकर गुजरते हुए कभी-कभी ड्रामा स्कूलों या यूनिवर्सिटी के थियेटर विभागों से पढ़ाई के बाद एक पेशेवर रंगकर्मी या फिल्म अभिनेता के रूप में आकर प्रकट होता है।
यह बात प्रदेश के प्रसिद्ध रंगकर्मी केहर सिंह ठाकुर ने कही। रंगमंच के क्षेत्र में दो दशकों से सक्रिय संस्था एक्टिव मोनाल कल्चरल एसोसिएशन ने रंगमंच एवं सिनेमा में कॅरियर की संभावनाएं विषय पर आधारित जिला स्तरीय सेमिनार का आयोजन शमशी में किया। इसमें जिले के 45 बाल, युवा और वरिष्ठ रंगकर्मियों ने भाग लिया।
सेमिनार में रंगकर्मी केहर सिंह ठाकुर ने रंगमंच एवं सिनेमा में कॅरियर की संभावनाएं विषय पर अपना वक्तव्य रखा। इस क्षेत्र में अपना भविष्य तलाशने की योजना लिए बाल एवं युवा रंगकर्मियों ने अपने प्रश्न उनके सामने रखे। रंगकर्मी ने शंकाओं का निवारण करते हुए कहा कि कैसे शौक-शौक में या दोस्तों की देखादेखी में नाटक करने आया एक युवा रंगकर्मी में तबदील हो जाता है।
धीरे-धीरे वह अपना भविष्य व्यावसायिक रूप से उसी क्षेत्र में तलाशने लगता है। रंगमंच में संसाधनों के अभाव में अधिकतर रंगकर्मी फिल्मों की ओर मुड़ जाते हैं और कुछ एक जुनून के साथ रंगमंच में ही डटे रहते हैं। उसी में अपने जीविकोपार्जन का प्रबंध कर लेते हैं। संवाद