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पैकिंग, दिल्ली के किराये के झंझट से बचे बागवान

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पतलीकूहल (कुल्लू)। पैकिंग और दिल्ली के किराये के झंझट से अब घाटी के बागवान बच रहे हैं। घाटी के 80 फीसदी बागवान कुल्लू के लाल रसीले सेब को स्थानीय मंडियों में ही बेचने को तरजीह दे रहे हैं। आंखों के सामने खुली बोली में सेब बिक रहा है। इसके साथ ही बागवानों को उनके उत्पाद की कीमत तुरंत अदा की जा रही है।
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दिल्ली की आजादपुर समेत अन्य मंडियों में बागवानों को पैसे मिलने में समय लगता है। बताया जा रहा है सेब को दिल्ली भेजने पर प्रति पेटी 80 रुपये तक खर्चा आ रहा है। स्थानीय बागवान खीमीदत्त, सोहन लाल, प्रेम चंद, कालू राम, मेहर चंद, कमल चंद, हरिनाथ, सुभाष, सरन सिंह, नीलचंद, नरेंद्र, सरजू, श्याम लाल, विरेंद्र, पवन और चांद कुमार ने कहा कि पहले वे अपना सेब दिल्ली और कोलकाता की सब्जी मंडियों में भेजते थे। लेकिन वहां सेब की बोली गुप्त तरीके से होती है। कई बार उन्हें पता भी नहीं चलता था कि उनका सेब किस दाम में बिका है। लेकिन स्थानीय मंडियों में उनके सामने ही खुली बोली लग रही है। ऐसे में उन्हें कोई शक की गुंजाइश भी नहीं है। खास बात यह है कि अगर स्थानीय मंडियों में बागवान को दाम उचित न लगे तो बेचने से मना कर किसी अन्य मंडी में सेब बेच सकता है। पारदर्शिता के चलते स्थानीय मंडियों में सालाना अरबों रुपये का कारोबार हो रहा है। पतलीकूहल सब्जी मंडी में आढ़ती संघ के अध्यक्ष फतेह चंद चौहान ने कहा कि स्थानीय मंडियों में बागवानों के हित सर्वोपरी हैं। लिहाजा बागवान बाहर की मंडियों के बजाय पतलीकूहल जैसी स्थानीय मंडियों को प्राथमिकता दे रहे हैं। एपीएमसी के सचिव सुशील गुलेरिया का कहना है कि बागवानों का स्थानीय मंडियों की ओर झुकाव काफी अधिक बढ़ा है।
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