मंदिरों में नारियल से ही पूरी हो रही परंपरा
माघी पर्व में पशु बलि की अब बदली रिवायत
उपमंडल में लोहड़ी की रात को कटते थे बकरे
अमर उजाला ब्यूरो
बंजार (कुल्लू)। देवभूमि कुल्लू के बंजार उपमंडल में बलि प्रथा की सदियों पुरानी परंपरा पर विराम लगा दिया है। कभी इस परंपरा के नाम सैकड़ों बकरे काटे जाते थे। वहीं अब इन रिवायतों पर कुछ हद तक ब्रेक लग गई है। लिहाजा जिला कुल्लू के बंजार, सैंज, रूपी, पार्वती घाटी में मनाए जाने वाले माघी उत्सव का मजा फीका हो गया है।
जानकारों के अनुसार जिला के कई स्थानों पर इस बार भी पशु बलि नहीं हो पाई। जिला के अनेक क्षेत्रों में मनाए जाने वाले इस उत्सव में मेहमान नवाजी के लिए हर घर में बकरों की धाम पकाई जाती थी। पूरे माह में मनाए जाने वाले इस त्योहार में पुरानी परंपराओं का वहन किया जाता था।
बंजारवासी चंदे राम ठाकुर, डाबे राम ठाकुर, ब्रिकम राम, तुलसी राम, गोविंद ठाकुर, होम दत्त, धनेश्वर ठाकुर, मोहन सिंह, राकेश, लोत सिंह, प्रेमराम, उदय और सोहन के अनुसार पहले कई बार तो ऐसी भी नौबत आ जाती थी कि बकरों की कमी महसूस होती थी। बलि प्रथा पर रोक के बाद अधिकतर इलाकों में बलि प्रथा के विरोध में नारियल से कार्य चलाने के फैसले लिए गए और माघी उत्सव का आगाज भी लोगों ने नारियल के साथ किया।
देवी-देवता कारदार संघ के महासचिव टीसी महंत, पुरषोत्तम शर्मा, सालगी राम, डोला राम ने कहा कि बलि प्रथा पर रोक के बाद अब यह परंपरा लगभग समाप्त हो गई है। युवा पीढ़ी भी बलि प्रथा के पक्ष में नहीं दिख रही है। इधर बंजार उपमंडल अधिकारी नागरिक अपूर्व देवगन ने कहा कि बलि प्रथा पर रोक के बाद सभी धार्मिक स्थलों पर बलि पर रोक लगाने में धार्मिक समुदाय के प्रतिनिधियों का सहयोग मिला है।