लाहौल घाटी में खिले रंग बिरंगे ट्यूलिप। -स्रोत : सीएसआईआर
पालमपुर (कांगड़ा)। हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिला लाहौल-स्पीति की बर्फीली वादियों में अब ट्यूलिप की खुशबू महकने लगी है। वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकी अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) पालमपुर के प्रयासों से लाहौल में विकसित किए गए ट्यूलिप गार्डन के बेहद सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं।
वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन और तकनीक के समावेश से लाहौल घाटी अब देश में ट्यूलिप बल्ब उत्पादन के प्रमुख केंद्र के रूप में उभर रही है, जिससे स्थानीय किसानों की आर्थिकी में बड़े बदलाव की उम्मीद है। लाहौल के उदयपुर क्षेत्र में इन दिनों प्रगतिशील किसानों के खेतों का नजारा किसी जन्नत से कम नहीं है।
रंग-बिरंगे ट्यूलिप के फूल पूरी खूबसूरती के साथ खिले हुए हैं, जो पुष्प कृषि (फ्लोरीकल्चर) की सफलता को उजागर कर रहे हैं। सीएसआईआर पालमपुर पिछले तीन वर्षों से यहां के किसानों को उच्च गुणवत्ता वाली रोपण सामग्री और वैज्ञानिक तकनीक उपलब्ध करा रहा है। संस्थान का मुख्य लक्ष्य ट्यूलिप बल्बों के आयात को कम करना और स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देना है।
परियोजना को प्रभावी बनाने के लिए सीएसआईआर संस्थान नई दिल्ली नगर पालिका परिषद के साथ मिलकर काम कर रहा है। यह साझेदारी उच्च गुणवत्ता वाले बल्बों के उत्पादन और व्यावसायिक विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इससे न केवल गुणवत्तापूर्ण बल्ब तैयार हो रहे हैं, बल्कि उनके संरक्षण की नई तकनीकों पर भी काम हो रहा है।
लाहौल की ठंडी जलवायु ट्यूलिप बल्ब उत्पादन के लिए वरदान है। यह पहल हिमालयी क्षेत्रों में वैज्ञानिक पुष्पोत्पादन के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि है। संस्थान का प्रयास है कि इस मॉडल को और व्यापक बनाकर अधिक किसानों को जोड़ा जाए, ताकि उन्हें आय का नया और टिकाऊ स्रोत मिल सके। -डॉ. सुदेश कुमार यादव, निदेशक, सीएसआईआर पालमपुर