...पहली नजर में कोई भी यह अंदाजा नहीं लगा सकता कि वह मर चुका है। ऐसा लगता है कि वह गहरी नींद में है। लेकिन आधुनिक विज्ञान इसे क्लीनिकल डैथ की संज्ञा दे रहा है। हालांकि उसके चेहरे की चमक कुछ और ही इशारा कर रही है।
मौत के बाद शरीर पर होने वाले अपघटन के कोई निशान नहीं। सौ से अधिक घंटे बीत चुके हैं लेकिन मृत शरीर से किसी तरह की गंध नहीं। सामान्य तापमान पर रखे बौद्घ भिक्षु के मृत शरीर को देखकर चिकित्सक भी हैरान हैं। ऐसा लगता है कि यह बौद्घ भिक्षु मरने के बाद भी जिंदा है।
92 वर्षीय गैंगिंग खेंतरुल रिंपोंछे की मौत बीते 9 मार्च को सुबह करीब 10 बजे धर्मशाला में हुई है। दो माह पूर्व गले में कैंसर होने पर उन्हें तिब्बतियों के डेलेक अस्पताल में भर्ती किया गया था। मौत के 100 घंटे बाद भी लगभग 20 डिग्री सेल्सियस के सामान्य तापमान में उनके मृत शरीर पर कोई फर्क नहीं पड़ा है।
डेलेक अस्पताल के चीफ मेडिकल ऑफिसर तेस्तेन दोरजे के मुताबिक इस रहस्य को सुलझाने के लिए अमेरिका से भी चिकित्सकों का एक दल यहां पहुंचा है। इस बौद्घ संत की मौत हालांकि कैंसर से हुई है लेकिन निगरानी में रखने के 24 घंटे बाद जब उन्होंने शव को देखा तो उसमें कोई फर्क नजर नहीं आया।
आमतौर पर मृतावस्था में शरीर का रंग बदल जाता है और उसमें गंध आ जाती है। वीरवार को उन्हें अंतिम प्रणाम करने के लिए डेलेक में अनुयायियों का तांता लगा रहा। बताते हैं कि बहुचर्चित पुस्तक एन 'ऑटोबायोग्राफी आफ ए योगी' के लेखक परमहंस योगानंद के साथ भी ऐसा ही हुआ था।
ढंकर मॉनिस्ट्री के प्रमुख थे रिंपोंछे
तिब्बती सांसद कर्मा यशी ने बताया कि रिंपोंछे स्पीति स्थित ढंकर मॉनेस्ट्री के प्रमुख थे। उन्हें महान मेडिटेशन प्रैक्टीशनर के रूप में जाना जाता था। धर्मगुरु दलाई लामा ने उनकी प्रतिभा को देखते हुए उन्हें ढंकर मॉनेस्ट्री में मठाधीश के पद पर नियुक्त किया था। उन्होंने बताया कि नौ मार्च को उनकी मौत के समय में वह स्वयं वहां मौजूद थे। उनके अनुसार मृत्यु के बाद उनके चेहरे की चमक और बढ़ गई।
यह विज्ञान नहीं चमत्कार : डॉ. पॉल
क्षेत्रीय फारेंसिक लैब में सहायक निदेशक डॉ. सुरेंद्र कुमार पॉल का कहना है कि आमतौर पर 36 से 48 घंटे बाद मानव शव का अपघटन शुरू हो जाता है। इसमें पेट फूल जाना और शरीर से दुर्गंध आना शामिल है। अगर 100 घंटे बाद भी सामान्य तापमान में कोई शव सही हालत में है तो यह कोई चमत्कार ही हो सकता है, लेकिन विज्ञान इसे नहीं मानता।