हिमाचल के कत्था कारोबार पर वियतनाम की मार
तीन सौ रुपये तक सस्ता बिक रहा सूबे का कत्था
पाकिस्तान से कारोबार तोड़ने का नहीं पड़ा असर
हरीश चंद्र
धर्मशाला। पाकिस्तान से व्यापार बंद करने का हिमाचल के कत्था कारोबार पर इतना असर अभी नहीं दिख रहा है, जितना वियतनाम के कत्थे के भारत के बाजार में आने से नुकसान हुआ है। वियतनाम के कत्था के बाजार में आने से लगभग 300 रुपये हिमाचली कत्थे के प्रतिकिलो दाम कम हुए हैं। वियतनाम का कत्था लगभग 750 रुपये किलो बाजार में मिल रहा है। हिमाचल का कत्था जहां करीब 1200 के आसपास बिकता था, अब वह 900 रुपये प्रतिकिलो बिक रहा है। कत्था एंजेट राजेश कुमार शर्मा और अक्षय पंडित ने कहा कि वियतनाम से कम गुणवत्ता वाला कत्था भारत में आयात हो रहा है। इससे हिमाचल के कत्था कारोबार को काफी नुकसान हो रहा है। लगभग तीन सौ रुपये तक प्रतिकिलो रेट में गिरावट आई है। जहां तक पाकिस्तान से व्यापार तोड़ने के कारण नुकसान की बात है, तो अभी कोई ज्यादा असर नहीं दिख रहा है। हो सकता है आने वाले दिन में इसका भी प्रभाव पड़े।
कांगड़ा में वर्तमान में करीब 20 भट्ठियों और पांच ब्वॉयलरों में खैर के पेड़ से कत्था तैयार किया जाता है। सूबे के हमीरपुर, सोलन और ऊना जिला के मुकाबले कांगड़ा में सबसे ज्यादा कत्था तैयार किया जाता है। कत्था खैर के पौधों से तैयार होता है। सोलन के नालागढ़, कांगड़ा के नूरपुर और ऊना जिले को अच्छी क्वालिटी के कत्था उत्पादन के लिए जाना जाता है। सूबे का कत्था 900 रुपये प्रतिकिलो बिकता है। खैर के पौधे की आयु 30 वर्ष होती है। इसमें 10 से 30 साल के बीच के पौधे का कत्था बनाने को कटान किया जाता है। 30 साल बाद अक्सर खैर का पेड़ खोखला हो जाता है।