'सरकार क्यों उड़ा रही है करोड़ों रुपये'
जयराम ठाकुर ने कहा कि जब माननीय उच्च न्यायालय ने सीपीएस की नियुक्ति को अवैध ठहराते हुए उन्हें तत्काल प्रभाव से हटाने और उनकी सभी सुविधाएं छीनने के आदेश दिए तो फिर सरकार उन्हें बचाने के लिए करोड़ों रुपए क्यों उड़ा रही है। इस फैसले में माननीय न्यायाधीश महोदय का कथन ‘यह पद सार्वजनिक सम्पत्ति पर कब्जा है और सभी सुविधाएं तत्काल प्रभाव से वापस ली जानी चाहिए’ और भी महत्वपूर्ण हैं। इतने कठोर निर्णय के बाद भी सरकार सीपीएस को बचाना चाहती है। उन्होंने कहा कि जिस एक्ट के तहत सीपीएस की नियुक्ति की गई थी बाद में न्यायालय द्वारा उसे भी निरस्त कर दिया गया है। इसके अलावा सरकार द्वारा हाई कोर्ट में पहले ही बताया जा चुका है कि सीपीएस के द्वारा कोई फाइल नहीं देखी जा रही है, कोई विधाई कार्य भी नहीं किया जा रहा है। जब वह कुछ कार्य कर ही नहीं रहे हैं, उनका जनहित में कोई उपयोग ही नहीं है तो सरकार उनकी नियुक्ति में करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद अब उन्हें बचाने के लिए फिर से करोड़ो रुपए क्यों पानी में बहा रही है। मुख्यमंत्री को समझना चाहिए कि उनकी गलती को हाई कोर्ट ने सुधार दी है। इसलिए जनहित के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले पैसे उन्हें इस तरह से बर्बाद नहीं करना चाहिए।
'लीगल फीस के रूप में लगभग दस करोड़ से ज्यादा खर्च'
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि अब तक सरकार इस मामले में सिर्फ लीगल फीस के रूप में लगभग दस करोड़ से ज़्यादा रुपए खर्च कर चुकी है और आगे भी यह सिलसिला रुकने वाला नहीं है। जबकि सरकार दो साल से सेंट्रल यूनिवर्सिटी के ज़मीन के पैसे जमा नहीं करवा पाई है। जिसकी वजह से सेंट्रल यूनिवर्सिटी का कैंपस नहीं बन पा रहा है। हिम केयर का बजट नहीं दिया जा रहा है। सहारा की पेंशन और शगुन का बजट नहीं दिया जा रहा है। बीमार इलाज को तरस रहे हैं, दवाई और जांच के लिए भटक रहे हैं। मेडिकल स्टूडेंट्स स्टाइपेंड के लिए तरस रहे हैं। कर्मचारी अपने मेडिकल बिल के लिए भटक रहे हैं, पेंशनर्स पेंशन की राह देख रहे हैं और इतने महत्वपूर्ण कामों को छोड़कर सरकार सीपीएस बचाने में जीजान से जुटी हुई है।