प्रतीकात्मक लंका दहन किया
देशभर में जहां विजयदशमी पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाकर दशहरे का समापन किया जाता है। वहीं कुल्लू दशहरा उत्सव के अंतिम दिन भगवान रघुनाथ की अगुवाई में लंका दहन की अनूठी परंपरा निभाई गई। इस दौरान मिट्टी और गोबर से बनाए गए रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के मुखौटों के साथ झाड़ियों को सांकेतिक रूप से जलाया गया। इस परंपरा में न आतिशबाजी होती है और न ही बड़े-बड़े पुतलों का दहन। सदियों पुरानी यह परंपरा कुल्लू की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान है।
ढाई बजे से शुरू हुई थी तैयारियां
भगवान रघुनाथ के अस्थायी शिविर में ढाई बजे से तैयारियां शुरू हो गई थीं। यात्रा शुरू होने से पहले नरसिंह भगवान की जलेब ढाई बजे राजा की चानणी से शुरू हुई और क्षेत्रीय अस्पताल, कॉलेज गेट, कलाकेंद्र होते हुए वापिस पहुंची। उसके बाद यहां रथयात्रा निकालने के लिए देव परंपरा का निर्वाहन किया गया। देवी-देवता अपने अस्थायी शिविर से रथ के पास पहुंचने शुरू हुए और उसके बाद लंका पर चढ़ाई के लिए रथ आगे बढ़ा। भगवान रघुनाथ के मुख्य छड़ीबरदार महेश्वर सिंह का कहना है कि दशहरा उत्सव पूरे रस्म के साथ संपन्न हो गया है। इसमें देवी-देवताओं और देव समाज से जुड़े लोगों ने परंपरा निभाने में अपना योगदान दिया है।