बागवानी से पशुपालन तक महिलाओं की अहम भूमिका
महिलाएं सेब के बगीचों में फसल के तुड़ान और ग्रेडिंग से लेकर पशुओं के लिए चारा जुटाने, उनकी देखभाल और दूध निकालने तक महिलाएं अहम भूमिका निभाती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में छोटी जोतों और पुरुषों के रोजगार के लिए बाहर जाने के बीच कृषि और पशुपालन की जिम्मेदारियां भी महिलाओं पर बढ़ी हैं। प्राकृतिक खेती और स्वयं सहायता समूहों ने महिलाओं के लिए कमाई के नए रास्ते खोले हैं। समूहों के माध्यम से महिलाएं प्राकृतिक खाद तैयार करने के साथ फल और सब्जियां बेच रही हैं। इससे उन्हें अपनी मेहनत का सीधा आर्थिक लाभ मिल रहा है और परिवार की आय में योगदान देने के अवसर बढ़ रहे हैं।
महिला श्रम बल भागीदारी में हमीरपुर देश में अव्वल
महिलाओं की आर्थिक भागीदारी के मामले में हमीरपुर जिला देशभर में पहले स्थान पर रहा है। यहां 15 वर्ष और इससे अधिक आयु की महिलाओं की श्रम बल सहभागिता दर 80.9 फीसदी दर्ज की गई, जबकि महिला श्रमिक जनसंख्या अनुपात 80 फीसदी रहा। ये आंकड़े ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की आर्थिक गतिविधियों में भागीदारी को रेखांकित करते हैं।
ताजी सब्जियां बेचकर महीने में कमा रहीं 15 हजार रुपये
मंडी जिले के करसोग की ग्राम लक्ष्मी स्वयं सहायता समूह की सदस्य सुनीता देवी बताती हैं कि प्राकृतिक खेती ने उन्हें खाद और दवाओं के लिए बाजार पर निर्भर रहने से काफी हद तक बचाया है। वे खुद जीवामृत तैयार करती हैं और ताजी सब्जियां बेचकर हर महीने 10 से 15 हजार रुपये तक कमाती हैं।
महिलाओं के श्रम पर टिकी है ग्रामीण अर्थव्यवस्था
ग्रामीण हिमाचल में घर और खेत अलग-अलग इकाइयां नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़ी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्थाएं हैं। छोटी जोतों और पुरुषों के पलायन के बीच खेती, बागवानी और पशुपालन की जिम्मेदारियां महिलाओं के कंधों पर बढ़ी हैं। महिलाएं ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, लेकिन उनके श्रम और आर्थिक योगदान को अपेक्षित सम्मान नहीं मिल रहा है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका को मजबूत बनाने के लिए उनके काम की पहचान, आर्थिक योगदान का उचित मूल्यांकन और बाजार तक उनकी पहुंच बढ़ाना जरूरी है। -डॉ. रुचि रमेश, प्राचार्य, दाड़लाघाट कॉलेज और समाजशास्त्री