याचिकाकर्ता का आरोप है कि कई अवसर देने के बावजूद अदालत के फैसलों को लागू नहीं किया जा रहा है। वहीं, विश्वविद्यालय ने तर्क दिया कि सीएएस के तहत लाभ देने का अंतिम निर्णय हिमाचल प्रदेश सरकार को लेना है। सरकार से स्पष्टीकरण मिलने के बाद ही कुछ किया जा सकता है। उन्होंने तर्क दिया कि हिमाचल प्रदेश भर्ती एवं सरकारी कर्मचारियों की सेवा शर्तें अधिनियम 2024 के लागू होने के बाद याचिकाकर्ता की ओर से विश्वविद्यालय में नियुक्ति से पहले दी गई अनुबंध सेवा पर विचार नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि जब यह निर्विवाद है कि विश्वविद्यालय पर यूजीसी के दिशा-निर्देश लागू होते हैं और सीएएस के लिए विश्वविद्यालय के दिशा-निर्देशों में भी प्रावधान है, तो पात्र उम्मीदवारों को सीएएस के तहत पदोन्नति देने के लिए सरकार की पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं है। अदालत ने कहा कि इसी तरह के मामलों में पहले भी फैसला सुनाया जा चुका है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा था। अदालत ने कहा कि प्रतिवादी जानबूझकर अदालत के फैसले को टालने की कोशिश कर रहे हैं।
न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश सुशील कुकरेजा की खंडपीठ ने लोक निर्माण विभाग के इंजीनियर इन चीफ की ओर से 26 जुलाई को जारी किए गए एक कार्यालय आदेश के कार्यान्वयन और निष्पादन पर मुख्य याचिका के लंबित रहने पर रोक लगा दी है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बाद ये लाभ दिए गए थे। ये फैसले सुप्रीम कोर्ट की ओर से राज्य की दायर एसएलपी याचिकाओं को खारिज करने के बाद अंतिम हो गए थे। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार को पूर्व व्यापी प्रभाव से कानून बनाने का अधिकार है लेकिन वह किसी सक्षम न्यायालय की ओर से दिए गए फैसलों को रद्द नहीं कर सकता।
अदालत ने राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए इस पर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 18 सितंबर को होगी। राज्य सरकार ने हिमाचल प्रदेश सरकारी कर्मचारियों की भर्ती और सेवा की शर्तें अधिनियम 2024 लागू होने के बाद याचिकाकर्ताओं को दिए गए लाभों को वापस लिया जा रहा है। ऐसा कार्य न केवल याचिकाकर्ताओं के हितों के लिए हानिकारक है बल्कि यह एक अवमानना पूर्ण कार्य भी है। यह कटौती हिमाचल प्रदेश लोक निर्माण विभाग की ओर से वरिष्ठ सहायक सीनियर असिस्टेंट के पद पर कार्यरत कर्मचारियों से लिए जा रहे हैं।