न्यायालय ने पाया कि दूसरी सजा 2013 में दी गई थी और इसलिए एक वर्ष की यह अवधि 2021 से काफी पहले ही समाप्त हो चुकी थी। राज्य सरकार की ओर से हिमाचल प्रदेश गुड कंडक्ट प्रिजनर्स (टेम्पोरेरी रिलीज) अधिनियम, 1968 की धारा 9 के स्पष्टीकरण पर दिए गए तर्क को न्यायालय ने खारिज कर दिया। चूंकि धारा 427(2) विशिष्ट रूप से आजीवन कारावास के बाद की सजाओं के एक साथ चलने का प्रावधान करती है, इसलिए यह प्रावधान लागू होता है।
याचिकाकर्ता को वर्ष 2000 में सत्र न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत दोषी ठहराया गया था और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। बाद में उसे हिमाचल प्रदेश गुड कंडक्ट प्रिजनर्स (टेम्पोरेरी रिलीज) अधिनियम, 1968 की धारा 9 के तहत दायर एक शिकायत में 2013 को एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। याचिकाकर्ता को 6 जनवरी 2025 को आजीवन कारावास के मामले में समय पूर्व रिहा करने का आदेश जारी किया गया था। हालांकि, उसे जेल से शारीरिक रूप से रिहा नहीं किया गया।
जेल अधिकारियों ने तर्क दिया कि उसे हिमाचल प्रदेश गुड कंडक्ट प्रिजनर्स अधिनियम, 1968 के तहत दर्ज दूसरे मामले में एक वर्ष की साधारण कैद पूरी करनी है। अदालत ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 427(2) के तहत जब कोई व्यक्ति जो पहले से ही आजीवन कारावास की सजा काट रहा हो, उसे बाद में किसी अपराध के लिए एक निश्चित अवधि के कारावास या आजीवन कारावास की सजा सुनाई जाती है, तो बाद की सजा पिछली सजा के साथ-साथ चलेगी। चूंकि याचिकाकर्ता को पहली सजा (आजीवन कारावास) के दौरान दूसरी सजा सुनाई गई थी, इसलिए दूसरी सजा (एक वर्ष का कठोर कारावास, जिसे अदालत ने साधारण कारावास बताया है) अनिवार्य रूप से पहली सजा के साथ-साथ चलेगी।