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कराहते पहाड़: हिमाचल में साल दर साल बढ़ रहीं बादल फटने की घटनाएं, बाढ़-भूस्खलन से तबाही

Sat, 06 Sep 2025 05:00 AM IST
अंकेश डोगरा अनिमेष कौशल, अमर उजाला नेटवर्क, शिमला

सार

हिमाचल प्रदेश में इसी मानसून सीजन में रिकॉर्ड 50 से ज्यादा जगह बादल फट चुके हैं। इस मानसून सीजन में प्राकृतिक आपदाओं की इन रिकॉर्ड घटनाओं में जान माल का सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। पढ़ें पूरी खबर...
 
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रिज मैदान शिमला। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
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हिमाचल प्रदेश में बादल फटने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। भारी बारिश, बाढ़ एवं भूस्खलन से हर साल तबाही हो रही है। इसी मानसून सीजन में रिकॉर्ड 50 से ज्यादा जगह बादल फट चुके हैं। अब तक बाढ़ की 95 और भारी भूस्खलन की 133 घटनाएं हो चुकी हैं। पहाड़ों पर पिछले 30 वर्षों में अत्याधिक बारिश की घटनाओं में 200 फीसदी तक बढ़ोतरी हो गई है। ग्लोबल वार्मिंग के साथ इसके लिए विशेषज्ञ पहाड़ों पर बन रहीं झीलों एवं बांधों को भी जिम्मेदार मान रहे हैं। उनका कहना है कि नब्बे के दशक में बादलों का फटना अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों तक सीमित था लेकिन अब ये घटनाएं निचले इलाकों में हर साल हो रही हैं।

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राज्य आपदा प्रबंधन के रिकॉर्ड के अनुसार साल 2018 से 2022 के बीच हिमाचल में बादल फटने की महज छह घटनाएं ही दर्ज हुईं, जबकि बाढ़ की 57 व भारी भूस्खलन की 33 घटनाएं सामने आईं। वर्ष 2023 में तीन बड़ी घटनाओं में 8 से 11 जुलाई, 14-15 अगस्त और 22-23 अगस्त को हिमाचल में भारी नुकसान हुआ। इस दौरान में 6 जगह बादल फटे, 32 बाढ़ और 163 भूस्खलन की घटनाएं हुईं। पूरे मानसून सीजन के दौरान 45 जगह बादल फटे, बाढ़ की 83 और भूस्खलन की 5748 घटनाएं हुईं। साल 2024 की बरसात के दौरान बादल फटने की 14, भूस्खलन की तीन और बाढ़ की 40 घटनाएं दर्ज की गईं।

इस मानसून सीजन में प्राकृतिक आपदाओं की इन रिकॉर्ड घटनाओं में जान माल का सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। आईआईटी रूड़की, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी देहरादून और अर्थ साइंस की विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार हिमालयी क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश की घटनाओं में पिछले 30 वर्षों में 200 फीसदी तक वृद्धि दर्ज की गई है। हिमाचल में आ रहीं ये आपदाएं भी जलवायु परिवर्तन और पहाड़ों पर बढ़तीं मानव गतिविधियों का परिणाम हैं। इनमें अंधाधुंध निर्माण, बिजली परियोजनाएं और कटान शामिल है। राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार जिला लाहौल-स्पीति में स्थित समुद्र टापू और गेपांग गथ जैसे ग्लेशियरों में झीलों के आकार में वर्ष 1979 से 2017 के बीच रिकॉर्ड वृद्धि हुई है। हिमालय में ग्लेशियर पिघलने की दर साल 2000 के बाद दोगुनी हो गई है।

पर्यावरणविद् कुलभूषण उपमन्यु का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते पहाड़ों में बर्फ तेजी से पिघल रही है। इसी कारण ऊंचे इलाकों में ग्लेशियर झीलों का निर्माण हो रहा है। जब अत्यधिक वर्षा होती है, तो इन झीलों की दीवारें टूट जाती हैं या इनमें जलभराव के कारण बादल फटने जैसी स्थिति उत्पन्न होती है। इन झीलों पर उचित निगरानी और प्रबंधन नहीं होने से ये टाइम बम बन चुकी हैं।

जल विद्युत परियोजनाओं के विशेषज्ञ आरएल जस्टा कहते हैं कि राज्य में तेजी से बन रहीं जल विद्युत परियोजनाएं और बांध स्थिति को और बिगाड़ रहे हैं। ये डैम स्थानीय जलवायु में सूक्ष्म स्तर पर परिवर्तन कर रहे हैं। जलाशयों में अत्यधिक वाष्पीकरण और स्थानीय नमी के असंतुलन से स्थानीय स्तर पर तीव्र बारिश की संभावना बढ़ती है। पहाड़ों को काटकर बनाए जा रही सुरंगों और सड़कों से भी भूगर्भीय अस्थिरता बढ़ रही है।

जल शक्ति विभाग से सेवानिवृत्त अधिशासी अभियंता सुभाष वर्मा का कहना है पहले बादल फटना केवल दुर्गम पर्वतीय इलाकों तक सीमित था, वहीं अब आबादी वाले इलाकों में भी ये घटनाएं आम होती जा रही हैं। शहरीकरण के कारण वनों और प्राकृतिक जल निकासी तंत्र नष्ट हुआ है। पहाड़ों पर कंक्रीट संरचनाएं और अवैध निर्माण जल प्रवाह को रोकते हैं, जिससे पानी जमा होकर अचानक तेजी से नीचे गिरता है, जो बादल फटने जैसा प्रभाव उत्पन्न करता है। बदलती जलवायु, अंधाधुध निर्माण और मानवीय लापरवाही ने हिमाचल के पहाड़ों को और संवेदनशील बना दिया है।

एक ही क्षेत्र में होने वाली 100 मिलीमीटर बारिश से फटते हैं बादल
बादल फटना मौसमी घटना है। यह बरसात का सबसे खतरनाक स्वरूप है। जिस भी इलाके में बादल फटने की घटना होती है, वहां भीषण और बहुत तेज बारिश होती है। इस घटना को मूसलाधार बारिश या क्लाउड बर्स्ट भी कहते हैं। इस घटना में एक ही जगह पर बादल से पानी बहुत तेजी से साथ गिरता है। इससे जानमाल को काफी क्षति होती है। इस दौरान बारिश लगभग 100 मिलीमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से होती है। इस घटना की मुख्य वजह है कि जब बादल पानी से पूरी तरह भरे होते हैं और आगे की ओर बढ़ते हैं तो वे पहाड़ों में फंस जाते हैं। पहाड़ों की ऊंचाई के चलते बादल पानी के रूप में बदलकर बरसते हैं। बादल पानी से भरे होते हैं जिससे उनका घनत्व ज्यादा होता है और बहुत तेज बरसात होती है। अक्सर दोपहर या रात के समय बादल फटते हैं। इस समय वातावरण में नमी और गर्मी का स्तर अधिक रहता है। ऐसे में एक ही स्थान पर कई लाख लीटर पानी एक साथ जमीन पर गिरने लगता है और नदी, नालों का जलस्तर बढ़ जाता है।

क्या कहते हैं मौसम वैज्ञानिक
मौसम विज्ञान केंद्र शिमला और चंडीगढ़ के निदेशक रह चुके सेवानिवृत्त वैज्ञानिक डॉ. मनमोहन सिंह ने बताया कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण पानी का वाष्पीकरण तेजी से बढ़ रहा है। घने क्यूम्यलोनिम्बस बादल जिन्हें थंडरहेड्स भी कहा जाता है। गरज और तूफान के साथ जुड़े होते हैं। ये बादल बहुत ऊंचे और विशाल होते हैं और बिजली, भारी बारिश, ओलावृष्टि और तेज हवाएं जैसी गंभीर मौसम की स्थिति पैदा कर सकते हैं। बंगाल की खाड़ी से आ रहीं पूर्वी हवाएं भी इसका कारण हैं। अब हिमालयी क्षेत्र में बार-बार और तेज बारिश के स्पैल देखने को मिल रहे हैं। पहले जहां सामान्य मानसून में एक समान वर्षा होती थी, अब एक ही दिन में महीनों की बारिश हो रही है। यह अत्यधिक वर्षा मृदा कटाव, भूस्खलन और बादल फटने जैसी स्थितियों को जन्म दे रही हैं।
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अभी टला नहीं है संकट, सतर्क रहने की जरूरत
प्रदेश में जारी खराब मौसम के बीच अभी प्राकृतिक आपदाएं आने का संकट टल नहीं है। सभी को सतर्क रहने की आवश्यकता है। मौसम विज्ञान केंद्र शिमला के वैज्ञानिक संदीप कुमार शर्मा ने बताया कि आठ सितंबर को ऊना, सिरमौर और नौ को बिलासपुर, कांगड़ा व सोलन के एक-दो स्थानों पर भारी बारिश होने का पूर्वानुमान है। लगातार बारिश होने की संभावना अब कम है। छह और सात सितंबर को हल्की से मध्यम बारिश ही होगी। 
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