अध्ययन में कुटकी (पिक्रोरिजा कुर्रोआ), चिरायता (स्वर्टिया चिरायता), अतीस (एकोनिटम हेटेरोफिलम), दारुहल्दी (बर्बेरिस एरिस्टाटा), रॉयलिया (रॉयलिया सिनेरिया) और बुरांश (रोडोडेंड्रोन आर्बोरियम) जैसी कई औषधीय प्रजातियों का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया गया। जुनिपर, ओगला/कुट्टू, कालमेघ, गुरमार, गिलोय, अश्वगंधा, अर्जुन, ब्राह्मी, नागफनी और रीठा भी इनमें शामिल हैं।
इन पौधों की सबसे बड़ी ताकत इनके प्राकृतिक जैव सक्रिय यौगिक हैं। इनमें फ्लेवोनोइड, एल्कलॉइड, फिनोल, सैपोनिन, टरपेनोइड, टैनिन, ग्लाइकोसाइड और पॉलीफेनोल प्रमुख हैं। ये तत्व शरीर में अलग-अलग स्तर पर काम करते हैं। कुछ यौगिक अग्नाशय की बीटा कोशिकाओं को सक्रिय रखने में मदद कर सकते हैं। कुछ इंसुलिन की कार्यक्षमता बेहतर बना सकते हैं। कई यौगिक भोजन के बाद रक्त में शर्करा बढ़ने की गति धीमी कर सकते हैं। कुछ तत्व कोशिकाओं में ग्लूकोज के बेहतर उपयोग में सहायता करते हैं। राजकीय आयुर्वेदिक अस्पताल छोटा शिमला की चिकित्सा अधीक्षक अंबिका खागटा ने बताया कि इन औषधीय ताकतों का आयुर्वेद में वर्णन है। इनका उपयोग अभी भी किया जा रहा है।
एक साथ आए पांच देशों के आठ संस्थानों के वैज्ञानिक शोध में शूलिनी यूनिवर्सिटी सोलन की महक ठाकुर, सौरभ वर्मा, भावना ठाकुर और तन्मय शर्मा शामिल रहे। ग्राफिक एरा डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी से देवेंद्र उप्रेती ने योगदान दिया। यूनिवर्सिटी ऑफ डेब्रेसेन हंगरी से भवनीश कुमार, यूनिवर्सिटी ऑफ न्यीरेजहाजा हंगरी से इवा हॉजिनोवा, यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर इन क्राको पोलैंड से अभिषेक शर्मा, यूनाइटेड अरब अमीरात यूनिवर्सिटी के मोहम्मद जिदान ने अध्ययन में योगदान दिया और अमेरिका से स्वतंत्र शोधकर्ता अली अबू-ओदेह भी शोध दल में शामिल रहे।