अब तक प्रदेश और अन्य राज्यों में स्वास्थ्य सेवाओं में इन मामलों का तुरंत प्रबंधन सुदृढ़ नहीं था। इसे मजबूत करने के लिए पहली बार उत्तरी भारत में यह कॉन्फ्रेंस आयोजित की जा रही है। वर्कशॉप में प्रशिक्षण लेने वाले चिकित्सक टॉक्सिकोलॉजी की उस शाखा में विशेषज्ञ हैं, जो टॉक्सिन और इनफेक्ट-बाइट संबंधित आपातकालीन स्थितियों के प्रबंधन से जुड़ी है। एम्स बिलासपुर के आपात विभाग में प्रतिदिन औसतन 6 टॉक्सिन और 5-6 सर्पदंश के मामले रेफर होते हैं।
ये सभी केस पीएचसी, सीएचसी, जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज से आते हैं। प्रशिक्षण का लक्ष्य है कि पीएचसी और सीएचसी स्तर पर प्रशिक्षित चिकित्सक उपलब्ध रहें। एम्स ने प्रदेश सरकार से आग्रह किया कि प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग के कर्मियों को इस क्षेत्र में प्रशिक्षित किया जाए। इसके बाद किन्नौर, लाहौल-स्पीति, मंडी, हमीरपुर, शिमला और बिलासपुर के पीएचसी और सीएचसी के 25 मेडिकल ऑफिसर इस वर्कशॉप में शामिल हुए हैं।
इसके साथ ही एम्स बिलासपुर के नर्सिंग अधिकारी, जूनियर और सीनियर रेजिडेंट भी प्रशिक्षण में भाग ले रहे हैं। उद्देश्य यह है कि अब प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर प्रशिक्षित चिकित्सक मौजूद होंगे, जिससे मरीजों को गोल्डन ऑवर में जीवनरक्षक इलाज मिल सके। एम्स दिल्ली, जम्मू, ऋषिकेश, जोधपुर, बीबीनगर, मदुरई, कल्याणी, नागपुर, सीएमसी वेल्लोर, पीजीआई चंडीगढ़, डीएमसी लुधियाना, मीनाक्षी मिशन हॉस्पिटल और रिसर्च सेंटर, आईजीएमसी शिमला और टांडा के विशेषज्ञ यहां सिखाने के लिए पहुंचे हैं।