यह अध्ययन हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग की कल्याणी सुप्रिया, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग की रिया चौहान और पर्यावरण विज्ञान विभाग डॉ. वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय नौणी के आरके अग्रवाल ने किया है। अध्ययन दिसंबर से जून तक नाहन से पांवटा साहिब के बीच 40 किलोमीटर लंबे हिस्से में किया गया। सड़क के दोनों ओर से पौधों के नमूने तीन अलग-अलग दूरियों, सड़क से पांच मीटर के भीतर, पांच से दस मीटर के बीच और दस मीटर से अधिक दूरी पर लिए गए।
इस क्षेत्र में चार प्रमुख पौध प्रजातियां गूलर, सिंदूरी, साल और सफेदा के पत्तों पर अध्ययन किया गया। पत्तियों में जल की मात्रा, क्लोरोफिल (हरा रंग), अम्लीयता (पीएच मान) और एस्कॉर्बिक अम्ल (विटामिन सी) से यह पता किया गया कि कौन सा पौधा प्रदूषण ज्यादा सहन कर सकता है। नतीजों में पाया गया कि चारों पौधे संवेदनशील श्रेणी में आते हैं क्योंकि इनका सहनशीलता सूचकांक 11 से कम रहा। लेकिन इनमें साल पेड़ का मान सबसे अधिक था। यह पेड़ अपने भीतर प्रदूषण को झेलने और वातावरण को स्वच्छ करने की अधिक क्षमता रखता है। इसके बाद सफेदे का प्रदर्शन मध्यम पाया गया, जबकि गूलर, सिंदूरी सबसे कमजोर निकले।