याचिकाकर्ता लाल चंद की भूमि वर्ष 1972 में ब्यास सतलुज लिंक प्रोजेक्ट (भाखड़ा ब्यास प्रबंध बोर्ड) के निर्माण के लिए भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत अधिग्रहीत की गई थी। वर्ष 2000 में राजस्व विभाग ने इस परियोजना की कुछ भूमि को अधिशेष (सरप्लस) घोषित कर अपने पास निहित कर लिया था। याचिकाकर्ता ने 1993/2001 के कुछ विभागीय पत्रों का हवाला देकर तर्क दिया कि चूंकि उनकी जमीन का कुछ हिस्सा खाली पड़ा है और केवल एक छोटे हिस्से पर जल शक्ति विभाग का पंप हाउस बना है, इसलिए बाजार मूल्य वसूल कर उनकी जमीन उन्हें वापस दी जाए।
अदालत ने पाया कि जिस 11 जनवरी 1993 के पत्र के आधार पर अधिशेष भूमि को मूल मालिकों को वापस देने की बात कही जा रही थी, उस पर सरकार की ओर से 4 मार्च 1993 को ही रोक लगा दी गई थी।अदालत ने पाया कि विवादित खसरा संख्या 1621 पर जल शक्ति विभाग ने पंप हाउस का निर्माण कर रखा है।जमीन का थोड़ा हिस्सा खाली रहने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि सरकार को उसकी आवश्यकता नहीं है। बची भूमि को भूमि अधिग्रहण कानून के प्रावधानों के तहत किसी भी स्थिति में पूर्व भू-स्वामी को वापस ट्रांसफर या असाइन करने का आदेश नहीं दिया जा सकता।
डुगर हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट पर सहमति बनाए सरकार, एनएचपीसी
प्रदेश हाईकोर्ट ने डुगर हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट को लेकर चल रहे विवाद में महत्वपूर्ण आदेश दिया है। अदालत ने सरकार और एनएचपीसी लिमिटेड के जिम्मेदार अधिकारियों को एक साथ बैठकर परियोजना के भविष्य पर आम सहमति बनाने और इसकी रिपोर्ट अदालत को सौंपने के लिए कहा। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल और न्यायाधीश योगेश जसवाल की खंडपीठ अब दो नवंबर को इस मामले की सुनवाई करेगी। एनएचपीसी ने अदालत में याचिका दायर कर मांग की थी कि या तो हिमाचल सरकार पूर्व में तय की गई शर्तों को बहाल करे ताकि परियोजना का काम तेजी से पूरा हो सके, या फिर अब तक हुए खर्च को ब्याज सहित लौटाकर इस प्रोजेक्ट को अपने हाथ में ले ले। इससे पहले 18 अगस्त को हुई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता कंपनी ने अदालत को बताया था कि राज्य सरकार की ओर से प्रोजेक्ट को वापस लेने के फैसले में हो रही देरी के कारण निर्माण लागत लगातार बढ़ रही है।
इसके अलावा ठेकेदारों के साथ उनकी कानूनी और अनुबंध शर्तें भी जुड़ी हुई हैं,जिससे भविष्य में कई जटिलताएं खड़ी हो सकती हैं। इस पर कोर्ट ने सरकार को अनिश्चितता खत्म करने के लिए छह सप्ताह के भीतर एक स्पष्ट समय-सीमा तय करने का आदेश दिया था। अब सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता कि ओर से कोर्ट को अवगत कराया गया कि पिछली समय-सीमा तय करने के आदेश के बावजूद राज्य सरकार की ओर से अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। राज्य सरकार ने अपना रुख बदलते हुए कोर्ट को बताया कि एनएचपीसी के पास ऐसे बड़े प्रोजेक्ट्स बनाने का बेहतरीन अनुभव है। इसलिए बेहतर होगा कि एनएचपीसी ही इस परियोजना का निर्माण कार्य पूरा करे। इसके निर्माण में जो भी खर्च आएगा, राज्य सरकार उसका उचित मूल्यांकन करने के बाद एनएचपीसी को उसकी प्रतिपूर्ति कर देगी। दूसरी तरफ, याचिकाकर्ता कंपनी ने प्रस्ताव दिया कि राज्य सरकार इस परियोजना को जैसा है, जहां है के आधार पर अपने कब्जे में ले ले। इसके साथ ही अब तक परियोजना पर कंपनी की ओर से किया गया सारा खर्च सरकार की ओर से वापस किया जाए।
जंगल की जमीन को कैसे बना सकत हैं डंपिंग साइट
प्रदेश हाईकोर्ट ने धर्मशाला शहर के आसपास वनों की भूमि को मलबे के ढेर के रूप में इस्तेमाल करने के प्रस्ताव पर सख्त नाराजगी जताई है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने इस मामले में वन विभाग और जिला प्रशासन की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अदालत ने इस बात पर भी निराशा जताई कि क्या जिला प्रशासन की ओर से अन्य विभागों की ऐसी खाली जमीनों की तलाश करने का कोई प्रयास किया गया, जिसका उपयोग इस काम के लिए किया जा सके। सुनवाई के दौरान कांगड़ा के डिप्टी कमिश्नर हेमराज बैरवा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश हुए। कोर्ट के कड़े रुख को देखते हुए उन्होंने आश्वासन दिया कि वह इस पूरे मामले और अन्य वैकल्पिक जमीनों की उपलब्धता को लेकर एक उचित हलफनामा दायर करेंगे। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने धर्मशाला के मुख्य वन संरक्षक को भी निर्देश जारी किए हैं कि वे इस गंभीर मुद्दे पर वन विभाग की तरफ से एक पूरक जवाब दाखिल करें। मामले की अगली सुनवाई 2 दिसंबर को होगी। उल्लेखनीय है कि धर्मशाला शहर के पास मलबे के निपटारे के लिए कुल 6 डंपिंग साइट्स की पहचान की गई है। हैरान करने वाली बात यह है कि इन 6 में से 5 साइट्स वन भूमि के अंतर्गत आती हैं।