आय प्रमाणपत्र में परिवार की हर स्रोत से आय दिखाना जरूरी : हाईकोर्ट
प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि आय प्रमाणपत्र जारी करते समय परिवार की सभी स्रोतों से अर्जित आय को शामिल करना अनिवार्य है। अदालत ने कहा कि चाहे आय मौसमी रोजगार या मस्टर रोल से ही क्यों न हुई हो, उसे आय प्रमाणपत्र में दर्शाया जाना आवश्यक है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने यह फैसला याचिकाकर्ता कुसुम लता की ओर से दायर याचिका को स्वीकार करते हुए दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि आय प्रमाणपत्र का मुख्य उद्देश्य किसी परिवार की वास्तविक स्थिति को सार्वजनिक रूप में लाना है। आय का स्रोत चाहे दिहाड़ी मजदूरी हो या मौसमी काम, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि एसडीओ सिविल के आदेश को सही माना जाता, तो इससे उन परिवारों के साथ भेदभाव होता जिनकी कोई आय नहीं है। उल्लेखनीय है कि घुमारवीं में आंगनबाड़ी केंद्र कोठी-2 में वर्ष 2007 में प्रतिवादी का चयन आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के तौर पर हुआ था। याचिकाकर्ता ने उसके आय प्रमाणपत्र को चुनौती दी। तहसीलदार घुमारवीं की ओर से कराई गई जांच में सामने आया कि प्रतिवादी चयनित उम्मीदवार के पिता ने ब्लॉक घुमारवीं में राजमिस्त्री के रूप में काम करके वर्ष 2006-2007 में 18,000 रुपये से अधिक की राशि प्राप्त की थी। चूंकि तत्कालीन आंगनबाड़ी नीति के अनुसार पात्रता के लिए अधिकतम वार्षिक आय सीमा 12,000 रुपये निर्धारित थी, इसलिए तहसीलदार ने 30 अगस्त 2011 को चयनित उम्मीदवार का आय प्रमाणपत्र रद्द कर दिया था। हालांकि, अपीलीय अधिकारी (एसडीओ सिविल) ने 26 जून 2013 के अपने आदेश से तहसीलदार के फैसले को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि मौसमी कार्य से हुई आय को बीपीएल नियमों के तहत कुल आय में नहीं जोड़ा जाना चाहिए। उच्च न्यायालय ने उपमंडल अधिकारी की ओर से 26 जून 2013 को पारित आदेश को कानून की नज़र में अमान्य करार देते हुए पूरी तरह से निरस्त कर दिया। अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए मामले से संबंधित नियमानुसार आगे की कार्रवाई के निर्देश दिए।
संपत्ति का उपयोग कैसे करना है, यह तय करना मकान मालिक का अधिकार
प्रदेश हाईकोर्ट ने शिमला के प्रसिद्ध लोअर बाजार स्थित दुकान को खाली कराने के आदेश को बरकरार रखते हुए महत्वपूर्ण फैसला दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि मकान मालिक की वास्तविक आवश्यकता का आकलन केवल याचिका दायर करने की तारीख से ही किया जाना चाहिए, न कि मामले के अंतिम निपटारे की तारीख से। न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की अदालत ने तल्ख लहजे में कहा कि अपनी संपत्ति का उपयोग कैसे करना है, यह तय करने का अधिकार सिर्फ मकान मालिक का है। किरायेदार मकान मालिक को यह निर्देश नहीं दे सकता कि वह अपनी संपत्ति का उपयोग किस तरह करे। अदालत ने शिमला के लोअर बाजार स्थित ग्राउंड फ्लोर की दुकान से जुड़े मामले में किरायेदार की ओर से दायर पुनर्विचार (समीक्षा) याचिका को खारिज कर दिया। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने रेंट कंट्रोलर शिमला और अपीलीय प्राधिकारी शिमला के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें किरायेदार को दुकान खाली करने का निर्देश दिया गया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि बेदखली का आदेश पारित होने के बाद या अपील लंबित रहने के दौरान मकान मालिक की मृत्यु हो जाती है, तब भी उनके कानूनी वारिस उस संपत्ति को खाली कराने के पूर्ण हकदार हैं। मृत्यु होने मात्र से परिवार की जरूरत खत्म नहीं होती। यह पूरा विवाद 360 वर्ग फीट की दुकान से संबंधित है, जिसे मकान मालिक ने वर्ष 1989 में खरीदा था। मकान मालिक ने वर्ष 2017 में किरायेदार के खिलाफ बेदखली याचिका दायर की थी। इसमें मुख्य रूप से दो आधार बनाए गए थे। पहला किराये का बकाया होना और दूसरा स्वयं के उपयोग (विशेषकर मरीजों की सुविधा के लिए एक्स-रे मशीन लगाने) के लिए दुकान की वास्तविक आवश्यकता। रेंट कंट्रोलर शिमला ने 20 अक्तूबर 2021 को मकान मालिक के पक्ष में फैसला सुनाते हुए दुकान खाली करने का आदेश दिया। 13 अक्तूबर 2023 को अपीलीय प्राधिकारी ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। मामला लंबित रहने के दौरान मूल मकान मालिकों (पति और पत्नी दोनों) का निधन हो गया। इसके बाद किरायेदार ने हाईकोर्ट के समक्ष तर्क दिया कि इस बाद के घटनाक्रम के कारण अब दुकान की निजी जरूरत का आधार ही समाप्त हो चुका है। किरायेदार का दावा था कि कानूनी वारिसों के पास पहले से ही पर्याप्त जगह उपलब्ध है, इसलिए बेदखली के आदेश को रद्द कर दिया जाना चाहिए।