हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने मानसिक स्वास्थ्य और पुनर्वास अस्पताल बालूगंज में मानसिक रोगियों की दयनीय स्थिति पर चिंता व्यक्त की है। अदालत ने जनहित याचिका का निपटारा करते हुए राज्य सरकार को रोगियों की बेहतर देखभाल और पुनर्वास के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। खंडपीठ ने मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 के तहत मानसिक रोगियों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी जिलों में चरणबद्ध तरीके से हाफ-वे-होम खोलने के निर्देश दिए हैं।
मुख्य न्यायाधीश गुरमीत संधावालिया और रंजन शर्मा की खंडपीठ ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 की धारा 19 के तहत मानसिक रोगियों को समुदाय में रहने का अधिकार है। राज्य का कर्तव्य है कि वह ऐसे मरीजों के लिए सहायता प्रदान करे। अदालत ने इस बात पर चिंता व्यक्त की है कि इलाज के बाद भी कई मरीजों को उनके परिवार वाले वापस नहीं ले जाते, जिससे उन्हें अस्पताल में ही रहना पड़ता है। अदालत को बताया गया कि राज्य में इस समय केवल दो हाफ-वे-होम हैं, जिनमें कुल 25 बिस्तर हैं। यह हाफ-वे-होम सामाजिक न्याय और अधिकारिता विभाग की ओर से वित्त पोषित है और एनजीओ की ओर से चलाए जा रहे हैं।
न्याय मित्र की ओर से अदालत को बताया गया कि वर्ष 2021 से 2025 के बीच बालूगंज अस्पताल में कुल 628 मरीजों में से 137 निराश्रित हैं। इन मरीजों को इलाज के बाद हाफ-वे-होम में स्थानांतरित करने की आवश्यकता होती है। जनहित याचिका में मानसिक अस्पताल में मरीजों की स्थिति और कुछ अधिकारियों की तैनाती को लेकर शिकायत की गई थी। इस पर हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया था।