याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि वर्क चार्ज स्टेटस में बिताई गई अवधि को पेंशन के लिए योग्यता सेवा में जोड़ा जाना चाहिए था। याचिकाकर्ता ने वर्क चार्ज और नियमित सेवा को मिलाकर कुल 17 साल से अधिक काम किया है। इसलिए वह पुरानी पेंशन पाने का हकदार है, जिसके लिए 10 साल की सेवा आवश्यक है। याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की थी कि उन्हें फरवरी 2017 से पेंशन, पेंशन का बकाया और रिटायरमेंट ग्रेच्युटी दी जाए।
उन्होंने अदालत को बताया कि उन्हें जनवरी 1990 से दैनिक वेतन भोगी के रूप में नियुक्त किया गया था। अदालत के आदेशों के बाद 1 जनवरी 2000 में उन्हें वर्क चार्ज स्टेटस दिया गया। इसके बाद उनकी सेवा 2006 में नियमित की गई और 28 फरवरी 2017 को वह सेवानिवृत्त हो गए। वहीं राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि याचिकाकर्ता की सेवाओं को 2006 में जब नियमित किया गया, उस समय वह नई पेंशन योजना के दायरे में था और उसे एक पीआरएएन नंबर भी आवंटित किया गया था।
उन्होंने कहा कि चूंकि सरकारी अधिसूचना के अनुसार 15 मई 2003 के बाद नियुक्त कर्मचारियों पर जीपीएफ नियम लागू नहीं होते हैं, इसलिए याचिकाकर्ता पुरानी पेंशन योजना का लाभ नहीं ले सकता। सरकार ने यह भी तर्क दिया कि याचिका 17 साल की देरी से दायर की गई है। न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ता ने वर्ष 2015 में रिट याचिका के माध्यम से इस अदालत का रुख किया था। न्यायालय ने यह भी कहा कि वर्क चार्ज स्टेटस अवधि को पेंशन लाभ के लिए गिनना एक स्थापित कानून है। अदालत ने सरकार की विलंब की दलील को भी खारिज कर दिया। अदालत ने यह फैसला नरेंद्र कुमार बनाम हिमाचल प्रदेश मामले में दिया है।