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हिमाचल हाईकोर्ट: सरकारी मकान पर कब्जे की अपील खारिज, 50 हजार जुर्माना बरकरार

Fri, 18 Sep 2026 05:00 AM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।

सार

मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने एकल पीठ के फैसले के खिलाफ दायर अपील को खारिज कर दिया है।  खंडपीठ ने एकल पीठ के 29 जुलाई 2026 के निर्णय में हस्तक्षेप करने से साफ मना करते हुए अपील खारिज कर दी।
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अदालत(सांकेतिक)। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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 हाईकोर्ट ने स्वास्थ्य विभाग के एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी की ओर से हमीरपुर में एक दशक से अधिक समय तक अनाधिकृत रूप से सरकारी आवास पर कब्जा बनाए रखने के मामले में कड़ा रुख बरकरार रखा है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने एकल पीठ के फैसले के खिलाफ दायर अपील को खारिज कर दिया है। खंडपीठ ने एकल पीठ के 29 जुलाई 2026 के निर्णय में हस्तक्षेप करने से साफ मना करते हुए अपील खारिज कर दी। याचिकाकर्ता पर 50,000 रुपये का जुर्माना (जो चीफ जस्टिस डिजास्टर रिलीफ फंड में जमा होना है) और 12.90 लाख रुपये की पेनल्टी रिकवरी का आदेश बरकरार रहेगा। खंडपीठ ने माना कि स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत के बिना इतने लंबे समय 2017 से अब तक सरकारी आवास का अवैध कब्जा संभव नहीं था।

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अदालत ने एकल जज की ओर से इस मामले में संलिप्त दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ जांच शुरू करने के दिए गए निर्देशों को बरकरार रखा है। अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि जब याचिकाकर्ता डॉ. नरेंद्र कुमार का तबादला शिमला हुआ, तो उन्हें 2022 में शिमला (परिमहल) में भी सरकारी आवास आवंटित कर दिया गया। बावजूद उनकी पत्नी जो शिक्षा विभाग में प्रधानाचार्य हैं। उन्होंने ने हमीरपुर स्थित क्षेत्रीय अस्पताल का ईयरमार्क्ड (डॉक्टरों के लिए आरक्षित) आवास खाली नहीं किया।इस तरह यह परिवार एक साथ दो-दो सरकारी मकानों पर कब्जा जमाए बैठा रहा। अदालत ने टिप्पणी की कि हमीरपुर का यह आवास विशेष रूप से ऑन-ड्यूटी और इमरजेंसी सेवाओं में तैनात डॉक्टरों के लिए आरक्षित था। याचिकाकर्ता के अड़ियल रवैये और अवैध कब्जे के कारण एक दशक तक अन्य योग्य डॉक्टरों को इस सुविधा से वंचित रहना पड़ा। इस बात पर सख्त नाराजगी जताई कि याचिकाकर्ता 60 वर्ष की आयु पूरी कर सेवानिवृत्त हो चुके हैं, फिर भी उन्होंने हमीरपुर स्थित इस सरकारी आवास पर अपना कब्जा बरकरार रखा हुआ है। कोर्ट ने इसे सरकारी कर्मचारी की ओर से शक्तियों और नियमों का पूर्ण उल्लंघन करार दिया।
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