अदालत ने एकल जज की ओर से इस मामले में संलिप्त दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ जांच शुरू करने के दिए गए निर्देशों को बरकरार रखा है। अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि जब याचिकाकर्ता डॉ. नरेंद्र कुमार का तबादला शिमला हुआ, तो उन्हें 2022 में शिमला (परिमहल) में भी सरकारी आवास आवंटित कर दिया गया। बावजूद उनकी पत्नी जो शिक्षा विभाग में प्रधानाचार्य हैं। उन्होंने ने हमीरपुर स्थित क्षेत्रीय अस्पताल का ईयरमार्क्ड (डॉक्टरों के लिए आरक्षित) आवास खाली नहीं किया।इस तरह यह परिवार एक साथ दो-दो सरकारी मकानों पर कब्जा जमाए बैठा रहा। अदालत ने टिप्पणी की कि हमीरपुर का यह आवास विशेष रूप से ऑन-ड्यूटी और इमरजेंसी सेवाओं में तैनात डॉक्टरों के लिए आरक्षित था। याचिकाकर्ता के अड़ियल रवैये और अवैध कब्जे के कारण एक दशक तक अन्य योग्य डॉक्टरों को इस सुविधा से वंचित रहना पड़ा। इस बात पर सख्त नाराजगी जताई कि याचिकाकर्ता 60 वर्ष की आयु पूरी कर सेवानिवृत्त हो चुके हैं, फिर भी उन्होंने हमीरपुर स्थित इस सरकारी आवास पर अपना कब्जा बरकरार रखा हुआ है। कोर्ट ने इसे सरकारी कर्मचारी की ओर से शक्तियों और नियमों का पूर्ण उल्लंघन करार दिया।