अदालत ने प्रधान सचिव वित्त को निर्देश दिए कि वह अगली सुनवाई पर अदालत को सूचित करें कि आगामी वर्ष के लिए न्यायपालिका के लिए कुल बजट का कितना प्रतिशत प्रावधान किया गया है। पिछले वर्ष की तुलना में इस बजट में कितनी वृद्धि हुई है। अदालत ने कहा कि सरकार केवल जिम्मेदारी एक अधिकारी से दूसरे पर डालने की कोशिश कर रही है। यदि अगली सुनवाई तक न्यायिक बुनियादी ढांचे को लेकर कोई प्रभावी और सक्रिय कदम नहीं उठाए गए तो कोर्ट सांविधानिक ढांचे के तहत और भी सख्त आदेश पारित करने के लिए मजबूर होगा।
कैबिनेट बैठकों पर उठाया सवाल, सरकार के आश्वासनों को खोखले वादे करार दिया
अदालत ने हैरानी जताई कि राज्य सरकार बंगाणा और हरोली में सिविल जज की अदालतें बनाने का प्रस्ताव दे रही है, जहां हाईकोर्ट ने मांग ही नहीं की थी, जबकि 34 अन्य आवश्यक अदालतों के प्रस्ताव पर कोई ठोस काम नहीं हुआ। अदालत ने कैबिनेट की बैठकों पर भी सवाल उठाए। कोर्ट को बताया गया है कि महीने में कम से कम दो बार कैबिनेट की बैठकें होती हैं, लेकिन 5 जनवरी 2026 के बाद से पदों के सृजन पर कोई सक्रिय कदम नहीं उठाया गया। अदालत ने सरकार के आश्वासनों को खोखले वादे करार दिया। खंडपीठ ने एनडीपीएस मामलों पर भी चिंता जताई। केंद्र सरकार की ओर से नशा निवारण के लिए विशेष अदालतों के गठन के बार-बार अनुरोध के बावजूद राज्य सरकार ने बुनियादी ढांचा बढ़ाने में कोई रुचि नहीं दिखाई। कोर्ट ने कहा कि राज्य हिमाचल को नशामुक्त बनाने का दावा तो करता है, लेकिन इन दावों को पूरा करने के लिए जरूरी प्रभावी कदम नहीं उठाए जा रहे।