सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में स्पष्ट किया है कि हिमाचल प्रदेश के जनजातीय इलाकों में बेटियों को पैतृक संपत्ति का अधिकार हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के तहत नहीं है। इन क्षेत्रों में रिवाजे आम (कस्टमरी लॉ) और सामाजिक रीति-रिवाज नियम ही लागू रहेंगे। न्यायाधीश संजय करोल और न्यायाधीश प्रशांत कुमार मिश्रा की खंडपीठ ने यह फैसला हिमाचल उच्च न्यायालय की ओर से 23 जून 2015 को दिए गए निर्णय के विरुद्ध दायर एक याचिका पर सुनाया है। उच्च न्यायालय के फैसल के खिलाफ 23 सितंबर, 2015 को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी।
खंडपीठ ने हाईकोर्ट के फैसले के पैरा नंबर 63 को रद्द कर दिया, जिसमें जनजातीय क्षेत्रों में भी बेटियों को हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत संपत्ति में अधिकार देने की बात कही गई थी। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अधिनियम की धारा 2(2) के अनुसार यह कानून अनुसूचित जनजातियों पर लागू नहीं होता, इसलिए उच्च न्यायालय का आदेश विधिक रूप से असंगत है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 के तहत अनुसूचित जाति और जनजातियों की सूची में किसी भी प्रकार का परिवर्तन केवल राष्ट्रपति की अधिसूचना से ही किया जा सकता है। किसी अन्य संस्था को यह अधिकार नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा कि जनजातीय समुदायों में संपत्ति से जुड़े मामलों में अब भी रिवाजे आम (कस्टमरी लॉ) और सामाजिक परंपराएं ही मान्य होंगी।
अदालत ने अपने फैसले में मधु किश्वर बनाम बिहार राज्य और अहमदाबाद विमेन एक्शन ग्रुप बनाम भारत संघ जैसे पूर्व मामलों का भी उल्लेख किया। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने हालिया फैसले तिरथ कुमार बनाम दादूराम का हवाला देते हुए कहा कि जब तक केंद्र सरकार की ओर से राजपत्र में अधिसूचना जारी नहीं होती, तब तक हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम अनुसूचित जनजातियों पर लागू नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल उच्च न्यायालय के अनुच्छेद-63 को निरस्त करते हुए कहा कि हाईकोर्ट ने अपील के मुख्य प्रश्नों से हटकर निर्णय दिया था, जो उचित नहीं था। याचिकाकर्ता सुनील करवा और नवांग बोध ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि यह निर्णय जनजातीय समुदायों की परंपराओं और सामाजिक ढांचे की रक्षा करने वाला है।