बाईपास के पास पार्क की खराब बेेसिक लाइफ स्पोट एंबुलेंस। संवाद
टांडा और शिमला भेजे जाते हैं मरीज, न मेडिकल स्टाफ, न ऑक्सीजन सिलिंडर
सरकारी एंबुलेंस की कमी से हो रही मरीजों को परेशानी
टैक्सियों को बनाया गया है एंबुलेंस, मरीजों की जान को डाला जा रहा खतरे में
संवाद न्यूज एजेंसी
हमीरपुर। जिले के सबसे बड़े अस्पताल डॉ. राधाकृष्णन मेडिकल कॉलेज में महज एक ही एंबुलेंस है। ऐसे में टैक्सियों और निजी अस्पतालों की एंबुलेंस को बुलाया जा रहा है और मरीजों को शिमला व टांडा रेफर किया जा रहा है। इन एंबुलेंस में न तो मेडिकल स्टाफ होता है और न ही जरूरी स्वास्थ्य उपकरण। ऐसे में मरीजों की जिंदगी से खेला जा रहा है। ऑक्सीजन सिलिंडर भी नहीं हैं। इससे रेफर मरीजों की सांस अटक रही है। निजी टैक्सियों पर एंबुलेंस लिखवाया गया है। सायरन लगवाया गया है और सरपट मरीजों को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल रेफर किया जा रहा है। इसमें स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं हैं। एडवांस लाइफ सपोर्ट एंबुलेंस में भी एक साथ चार से पांच मरीज भेजे जा रहे हैं। क्षेत्रीय अस्पताल से मेडिकल कॉलेज तो बना दिया गया है लेकिन मूलभूत आवश्यकताएं भी पूरी नहीं हो पा रही हैं। इससे मरीज बेहाल हैं। निजी एंबुलेंस वाले मनमाने दाम वसूल रहे हैं। शिमला जाने के लिए सात से आठ हजार और टांडा के लिए पांच से छह हजार रुपये मरीजों को चुकाने पड़ रहे हैं। तीमारदारों कमलजोत, विजय, रणवीर, कुमुद, सलोचना, विवेक आदि ने कहा कि एंबुलेंस की कमी के कारण निजी अस्पतालों की एंबुलेंसों में जाना पड़ता है। इससे खासी परेशानी होती है और वह मनमाने दाम वसूले जाते हैं। इस बारे में मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. रमेश भारती ने कहा कि अस्पताल में एक ही एंबुलेंस है।
सड़क किनारे खड़ी की है खराब एंबुलेंस
मेडिकल कॉलेज हमीरपुर की बेसिक लाइफ सपोर्ट एंबुलेंस लंबे समय से खराब है। आजकल यह एंबुलेंस बाईपास के पास सड़क किनारे खड़ी की गई है। इस एंबुलेंस की जगह नई कोई एंबुलेंस नहीं आई और मेडिकल कॉलेज ने इस खराब एंबुलेंस को भी कबाड़ की तरह सड़क किनारे खड़ा कर दिया है।