प्रदेश में देवदार और शंकुधारी प्रजातियों के पेड़ों की जड़ों को अधिक गहराई और मजबूती देने के लिए हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान ने विशेष माइकोराइजल जैव उर्वरक तैयार किया है। यह तकनीक प्रदेश में शंकुधारी वनों के विस्तार में आ रही समस्याओं का समाधान कर सकती है क्योंकि अभी तक पौधों का जीवित रहने का प्रतिशत बेहद कम रहा है। संस्थान ने वर्षों के शोध के बाद देवदार, रई, तोष, चीड़ और जूनिपर के लिए स्थानीय फंगस रमैरिया फोरमोसा पर आधारित एक्टोमाइकोराइजल जैव उर्वरक तैयार किया है। इसे ‘हिम ग्रोथ बूस्टर’ नाम दिया गया है। प्रारंभिक फील्ड ट्रायल में पाया गया है कि इस जैव उर्वरक के प्रयोग से पौधों की जड़ें अधिक गहरी और मजबूत होती हैं। पौधों के पोषक तत्व अवशोषण की क्षमता में उल्लेखनीय बढ़त हुई। इससे पौधों के जीवित रहने की दर बढ़ी है।
ऐसे काम करता है हिम ग्रोथ बूस्टर
वैज्ञानिकों के अनुसार माइकोराइजल फंगस (हिम ग्रोथ बूस्टर) जड़ की सतह पर फंगल मैंटल बनाता है। इससे जड़ कोशिकाओं के बीच हार्टिंग नेट बनता है। इससे पौधे और फंगस के बीच पोषण का आदान-प्रदान होता है। इससे पौधों को फास्फोरस, नाइट्रोजन, पोटाशियम और सूक्ष्म पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं। फंगस मिट्टी की संरचना को सुधारकर नमी धारण क्षमता बढ़ाता है। इससे पौधे सूखे, अत्यधिक ठंड या जलवायु परिवर्तन के तनाव जैसी स्थितियों में भी टिकाऊ बने रहते हैं।
पहाड़ी ढलानों और पथरीली मिट्टी में देवदार की जड़ों का पर्याप्त गहराई में न पहुंच पाना, पौधों की कमजोरी और कम सर्वाइवल रेट का मुख्य कारण रहा है। माइकोराइजल जैव उर्वरक इस समस्या को हल करता है। इसके उपयोग से पौधों की वृद्धि तेज होती है। रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। जलवायु जनित प्रतिकूलताओं से भी पौधे सुरक्षित रहते हैं।- डॉ. अश्वनी तपवाल, वैज्ञानिक, हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान
उपयोग की पद्धति सरल
इस जैव उर्वरक का उपयोग आसान है। नर्सरी में बीज बोने के समय पॉलीबैग की मिट्टी में 1-2 ग्राम जैव उर्वरक मिलाया जाता है। पौधरोपण के दौरान गड्ढे में 4-5 ग्राम उर्वरक डालने से शुरुआती दिनों में ही सहजीवी संबंध स्थापित हो जाता है। 3-4 सप्ताह में फंगस सक्रिय हो जाता है और जड़ों के साथ नेटवर्क बना लेता है, जबकि एक माह में इसके सकारात्मक परिणाम दिखने लगते हैं।