देवता की जन्मस्थली से शांत में शामिल नहीं हुई पालकी
जिले की सबसे ऊंची चोटी चूड़धार में शिरगुल देवता की तपोस्थली पर बने भव्य मंदिर का शांत एवं करुड़ स्थापना कार्यक्रम आयोजित हुआ। इस दौरान जिला सिरमौर के साथ-साथ शिमला, सोलन व उत्तराखंड से हजारों से श्रद्धालुओं ने शिरकत की। लेकिन यहां शिरगुल देवता की जन्मस्थली शाया से पालकी नहीं पहुंच सकी। बता दें कि राजगढ़ का शाया क्षेत्र जिला सिरमौर और शिमला के प्रमुख आराध्य देव शिरगुल महाराज की जन्मस्थली के रूप में जाना जाता है जबकि चूड़धार को उनकी तपोस्थली कहा गया है। ऐसे में जब आराध्य देव की तपोस्थली में भव्य कार्यक्रम आयोजित हुआ तो यहां जन्मस्थली से ही पालकी नहीं पहुंच पाई। इसके बाद यहां से श्रद्धालु भी शामिल नहीं हो पाए। शाया मंदिर के पुजारी व भण्डारी पृथ्वीराज ठाकुर ने बताया कि उन्हें मात्र चार दिन पूर्व निमंत्रण मिला, जिसके चलते वह देवता के अन्य मंदिरों व समस्त श्रद्धालुओं को आमंत्रित करने में असमर्थ थे। इसके चलते राजगढ़ क्षेत्र से श्रद्धालु चूड़धार में आयोजित शांत व करुड़ में शामिल नहीं हो पाए।
ज्यादा भीड़ बढ़ी तो कुछ जगह पर रोकना पड़ा श्रद्धालुओं को
सिरमौर जिले की सबसे ऊंची चोटी व प्रसिद्ध धार्मिक स्थल चूड़धार में शुक्रवार को आस्था का सैलाब उमड़ा। यहां आयोजित शांत महायज्ञ में शिमला, सोलन व सिरमौर सहित उत्तराखंड से पहुंचे श्रद्धालुओं ने शीश नवाया और आशीर्वाद ग्रहण किया। कालाबाग से चूड़धार तक करीब दो किलोमीटर क्षेत्र में हजारों की संख्या में श्रद्धालु जुटे। अधिक भीड़ जुटने के कारण सुबह 10 बजे के बाद नौहराधार के रास्ते से आने वाले श्रद्धालुओं को कुछ जगह पर रोकना पड़ा। ज्यादा संख्या में श्रद्धालु पहुंचने के कारण कई जगह पर उनको वाहन पार्किंग में भी परेशानी का सामना करना पड़ा। दोपहर 12 बजकर 56 मिनट पर कुरड़ मंदिर पर लगी। करीब 28 सितम्बर से कुरुड़ बनाने का कार्य चला हुआ था। इसमें सुखराम, बारू राम, हीरा सिंह, सत्य देव, वीरेंद्र, प्रदीप, बलबीर आदि लोगो ने काम किया। ये कांड बनाह, सराह के श्वेइक, ओर बाग मंझोली के निवासी हैं। पंडित सुख राम ने बताया कि उनके पिता स्वर्गीय जयीया राम ने 1972 में कुरुड़ बनाया था। उस समय एक ही कुरुड़ लगाया गया था, जबकि इस बार सात कुरुड़ लगाए गए हैं। उन्होंने बताया कि उनका सौभाग्य है कि उन्हें भी 52 साल बाद शिरगुल महाराज का कुरुड़ बनाने का मौका मिला। मंदिर का निर्माण करीब 52 साल पहले हुआ था। 20 साल पहले नए मंदिर का निर्माण कार्य शुरू किया गया था।
चूडि़या दानव से मुक्ति दिलाने के लिए उत्पन्न हुए थे शिरगुल महाराज
शिरगुल महाराज के इतिहास को लेकर कई दंतकथाएं और कहानियां प्रचलित हैं। बताया जाता कि चूडि़या दानव के अत्याचार से मुक्ति के लिए शिरगुल महाराज ने जन्म लिया था। राजगढ़ में राज परिवार में जन्मे शिरगुल महाराज के दो भाई-बहन हैं जो, अब बिजट और बिजाई के नाम से सिरमौर व शिमला के क्षेत्रों में देवता के रूप में पूजे जाते हैं। बताया जाता कि पिता भुकड़ महाराज सिरमौर रियासत के पराक्रमी योद्धा माने जाते थे। मुगलों के समय जब पूरे भारत के शक्तिशाली राजाओं को बंदी बनाया गया, उसमें शिरगुल महाराज भी शामिल थे। उसमें देवशक्ति प्रकट हुई तथा मुगलों को ध्वस्त कर राजाओं को बंधन मुक्त कर हिमाचल लौटे थे।
आदि शंकराचार्य ने की थी शिवलिंग की स्थापना
मान्यताओं के अनुसार आदि शंकराचार्य जब हिमाचल प्रवास पर आए थे तब उन्होंने पवित्र चोटी पर शिवलिंग की स्थापना की थी। मंदिर के समीप दो प्राकृतिक बावडि़यां हैं, जिसके जल का लोटा श्रद्धालु सिर पर डालने के उपरांत मंदिर में दर्शनों के लिए जाते हैं।