बस सड़क से नीचे उतरते ही पलटने लगी। एक के बाद एक कई पलटे खाती बस के भीतर चीख-पुकार मच गई। हर तरफ अफरा-तफरी थी। इसी बीच 32 वर्षीय सुष्मिता ने अपनी सीट के लोहे के हैंडल को कसकर पकड़ लिया। बस लुढ़कती रही, लेकिन उन्होंने सीट का सहारा नहीं छोड़ा। उनके मन में उस वक्त सिर्फ एक ही बात थी कि किसी तरह जिंदगी बच जाए।
चलुंज बस हादसे में घायल सुष्मिता पुत्री प्रमोद कुमार निवासी अयोध्या को उपचार के लिए मेडिकल कॉलेज चंबा लाया गया। हादसे की आपबीती बताते हुए उन्होंने कहा कि बस के पलटते समय उन्हें एक पल के लिए लगा कि शायद वह जिंदा नहीं बच पाएंगी। बस लगातार नीचे की ओर लुढ़कती रही और उन्होंने डर के बावजूद सीट के लोहे को मजबूती से थामे रखा।
कुछ देर बाद जब बस रुकी तो उनकी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा और वह बेहोश हो गईं। हादसे में घायल सुष्मिता के शरीर पर चोटें आई हैं। मेडिकल कॉलेज चंबा में प्राथमिक उपचार के बाद चिकित्सकों ने उन्हें बेहतर उपचार के लिए टांडा मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया।
सीट का सहारा बना जिंदगी की डोर
हादसे के दौरान सुष्मिता ने जिस तरह सीट के हैंडल को पकड़े रखा, वही उनके लिए बड़ा सहारा बना। बस के कई बार पलटने के दौरान उन्होंने पकड़ नहीं छोड़ी। हादसे के उस खौफनाक पल को याद करते हुए उनके चेहरे और आवाज में डर साफ झलक रहा था। चिकित्सकों की निगरानी में उपचार के बाद उनकी स्थिति को देखते हुए उन्हें टांडा रेफर किया गया है। फिलहाल उनकी जिंदगी डॉक्टरों के भरोसे है।