- आपसी प्रेम व भाईचारे से रहना सिखाती है श्रीमद्भागवत कथा
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। पृथ्वी पर जब भी अत्याचार और पाप बढ़ता है, उसका नाश करने के लिए भागवान खुद अवतार लेते हैं। जब अत्याचारी कंस के पापों से धरती डोलने लगी, तो भगवान कृष्ण को अवतरित होना पड़ा।
अपनी अन्य संतानों की तरह गर्भवती देवकी को कंस के हाथों अगली संतान की मृत्यु का भी भय सता रहा था, लेकिन श्रीकृष्ण के जन्म लेते ही उनकी लीला से कारागार के सभी बंधन टूट गए। यह उद्गार कथा व्यास आचार्य जीवानंद शैल ने दनोह-कुनाला स्थित गोपाल मंदिर में आयोजित किए जा रहे श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह में वीरवार को चौथे दिन श्रीकृष्ण के जन्म का प्रसंग सुनाते हुए प्रकट किए। इस दौरान श्रीकृष्ण जन्म की मनमोहक झांकी भी निकाली गई। कान्हा के जन्म उत्सव पर भजन की प्रस्तुति के दौरान श्रद्धालु झूम उठे। आचार्य शैल ने कहा कि मनुष्य को कभी भी अहंकार नहीं करना चाहिए। अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। यह बुद्धि और ज्ञान का हरण कर लेता है। कलिकाल में सत्संग की अत्यधिक जरूरत है। भागवत कथा समाज को जोड़ना और सभी को आपसी प्रेम और भाईचारे से रहना सिखाती है। वर्तमान में बेशुमार धन-दौलत और संपत्ति होने के बावजूद मनुष्य दुखी रहता है। इसका कारण यह है कि वह अज्ञान रूपी मोह में फंसा है। मनुष्य को यह बात समझनी चाहिए कि चाहे अथाह संपत्ति हो या भोग-विलास और ऐशोआराम के अन्य साधन, कुछ भी स्थायी नहीं हैं। उसे अपने कर्मों का फल भुगतना ही पड़ता है। श्रीराम कथा जहां जीवन जीना सिखाती है, वहीं भागवत कथा मृत्यु को सुधारती है। मनुष्य को चाहिए कि सांसारिक मोहमाया में फंसने के बजाए वह हरि चरणों में ध्यान लगाते हुए परोपकार करे। इससे उसके सभी लोक सुधर जाएंगे।