संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। कल्याण कला मंच बिलासपुर की बहुभाषी मासिक संगोष्ठी का आयोजन बल्ह बल्हवाणा में किया गया। बैठक में विशिष्ट अतिथि के रूप में आशा राम भगत उपस्थित रहे। संगोष्ठी की अध्यक्षता सुषमा खजूरिया ने की। जबकि मंच संचालन शीला सिंह ने किया। मां सरस्वती व काले बाबा की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण कर पूजा अर्चना के साथ संगोष्ठी की शुरूआत की गई।
लेफ्टिनेंट डॉ. जय चंद महलवाल ने मां सरस्वती की वंदना प्रस्तुत की। प्रथम सत्र में रामपाल डोगरा ने बिलासपुर की विभूति संत राम संत के व्यक्तित्व पर विचार रखे। दूसरे सत्र में बहुभाषी काव्य गोष्ठी में रविंद्र चंदेल कमल ने स्वर्ग से भी सुंदर प्रदेश हमारा प्रदेश में अतुलनीय बिलासपुर हमारा, जीत राम सुमन ने मैं कियां सुणाऊं मित्रों ए दुख भरी कहाणी होले -होले काय नी बगदी नदी तू मुईए ब्यासा, शीला सिंह ने ऐ रघुवर अमृत कर दो भिलनी के जूठे बेर बाट निहारूं पलक अब न लगाओ देर , चिंता देवी ने होले होले बगया ओ ब्यासा दे पाणियां अप्पू कन्ने लेई गया तू कई जिंदगानिया, अमरनाथ धीमान ने हऊं गद्दी तू गद्दन बणी जाया मेरी इक्क दिन हऊं कल्ला बैठी ने सोचणे लगी रा प्रस्तुत की।्
बिन्दरू देवी ने कहां गई मेरी कखां वाली झोपड़ी कहां गए मेरे बाल बच्चे क्या करने मेरे महल तां मोरियां , जोगिंद्र महाजन ने हिंदी के रंग कल्याण कला मंच के संग हिंदी हमारी आन है हिंदी हमारी शान हैं, वीर सिंह चंदेल ने डुग्गी-डुग्गी नदियां बड़ी तेज़ धारा ओ ओ अडया पतणा देया तारूआ बेड़ी मेरी पार लाई दे, मुस्कान ने गुरुदेव मेरे दाता मुझे ऐसा वर दो सेवा सिमरन सत्संग झोली में मेरे भर दो , साध महन्त दास ने सत्संग ऐसा जाणिऐ इक्को नाम बखाणिऐ , लेफ्टिनेंट डॉ. जय चंद महलवाल ने आजकला दे छोहरू बड़े गाजले मोबाइला लेईने दूजे कमरे नठ्ठदे, हनी पढ़दे कॉलजे , साक्षी ने आज़ादी का अमृत महोत्सव भारत की सांस्कृतिक , सामाजिक , धार्मिक विकास यात्रा है सुनाई।
आचार्य जगदीश चंद सहोता ने पितरा रिया यादां नी भुलाई जाणिया कर्म करो चाहे न करो, जगतपाल शर्मा ने योगासन बृषभ आसन ताड़ आसन , तृप्ता कौर मुसाफिर ने बंदया छड़ दे करने मैं मैं मेरी ऐ तन होणा भस्म दी ढेरी कलहे आऊणा कलहे जाणा किसे ने नी तेरा साथ निभाणा , सुरेंद्र सिंह मिन्हास ने बिलासपुरा आई जाणी रेल हुण कित्ती बाणी फसलां कित्ती होणे खेल , आशाराम भगत ने श्री कृष्णा गुफा में बैठे थे भील ने चलाया तीर भगवान श्री कृष्ण ने कहा हे राम हे राम , सुशील पुंडीर परिंदा ने ना मनाना श्राद्ध मेरा तुम मजबूरी समझता हूं मैं श्राद्ध ना मानना मेरा तुम जमाने की नजाकत समझता हूं मैं , सेवानिवृत्त प्राचार्य डीआर चौहान ने सब सफर में है सब मुसाफिर यहां ठहरने की किसी को इजाजत नहीं , वीना देवी , लीला देवी , ऋतंभरा , मोहित , आदित्य ने भी अपनी कविताएं प्रस्तुत की । अंत में आचार्य जगदीश चंद सहोता ने आए हुए सभी साहित्यकारों व गणमान्य जनों का आभार जताया ।