मौका जांच में एक ही आरसीसी पिलर मिला, अधिकांश क्षेत्रों में नहीं मिला कोई चिह्न
12-13 साल की प्रक्रिया पर सवाल, विभागीय समन्वय और कार्यप्रणाली कटघरे में
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। कीरतपुर-नेरचौक फोरलेन परियोजना के तहत परिवर्तित वन भूमि पर बुर्जियों की स्थापना को लेकर गंभीर अनियमितताएं सामने आई हैं। अरण्यपाल वन सर्कल बिलासपुर द्वारा समय-समय पर दिए गए निर्देशों के बावजूद ताजा प्रगति रिपोर्ट एक बार फिर शून्य पाई गई है, जिससे पूरे मामले में विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं।
बीट प्रभारी कोठीपुरा की ओर से तैयार की गई मौका छानबीन रिपोर्ट, जिसे वन परिक्षेत्र अधिकारी सदर के माध्यम से जन सूचना अधिकारी व अधीक्षक को भेजा गया, उसमें स्पष्ट किया गया है कि मौके पर आरसीसी पिलर के नाम पर केवल एक ही बुर्जी मंडी-भराड़ी पुल के पास पाई गई। रिपोर्ट के अनुसार इस पिलर का जीपीएस लोकेशन ई 31.2970.19 और एन 76.745204 दर्ज किया गया है। इसके अलावा पूरे क्षेत्र में अन्य कोई राइट ऑफ वे आरसीसी पिलर मौजूद नहीं मिला। रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि मौके पर मौजूद इस एकमात्र पिलर पर न तो बैक बियरिंग और फ्रंट बियरिंग अंकित है और न ही पिलर नंबर दर्ज है, जो निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुरूप नहीं है। वन परिक्षेत्र अधिकारी सदर ने अपनी रिपोर्ट में वन खंड अधिकारी को अवगत कराया कि हरलोग और मल्यावर बीट के अंतर्गत आने वाली वन भूमि (सी-8 नैण गुजरां और सी-9 टिहरा) यूजर एजेंसी राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) को हस्तांतरित की जा चुकी है, लेकिन मौके पर एक भी बुर्जी स्थापित नहीं है। वन परिक्षेत्र घुमारवीं की रिपोर्ट में बताया गया कि एनएचएआई अधिकारियों के अनुसार कीरतपुर की ओर से बुर्जियों के पुनर्स्थापन का कार्य चल रहा है और टीम के मल्यावर बीट की ओर पहुंचने पर वन विभाग को सूचित किया जाएगा।
इसके अलावा वन परिक्षेत्र स्वारघाट, झंडूता और अन्य क्षेत्रों की मौका जांच रिपोर्ट में भी बुर्जियों की प्रगति शून्य ही दर्शाई गई है, जिससे स्पष्ट है कि जमीनी स्तर पर कार्य नगण्य है। गौरतलब है कि वन भूमि के हस्तांतरण और परियोजना कार्यों में बुर्जियों की स्थापना अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया मानी जाती है। इन्हीं के आधार पर भूमि की सीमाएं तय की जाती हैं, पेड़ों की पहचान, गणना और मूल्यांकन किया जाता है तथा बाद में वन निगम को दोहन के लिए सौंपा जाता है। ऐसे में पिछले 12-13 वर्ष से चल रही इस प्रक्रिया में बुर्जियों का स्पष्ट रिकॉर्ड न होना और मौके पर उनकी अनुपस्थिति कई गंभीर सवाल खड़े करती है। स्थिति यह है कि विभाग के किसी भी स्तर पर यह स्पष्ट नहीं है कि बुर्जियां कब, किसके निर्देश पर और किन परिस्थितियों में स्थापित की गईं, और उस समय कौन-कौन अधिकारी मौके पर मौजूद थे। पूरे घटनाक्रम से यह भी संकेत मिलता है कि संबंधित विभागों के बीच समन्वय की कमी रही है और कई स्तरों पर केवल कागजी कार्रवाई तक ही प्रक्रिया सीमित रही है। ऐसे में अब यह मामला जांच का विषय बनता जा रहा है। यदि समय रहते स्थिति स्पष्ट नहीं की गई, तो परियोजना से जुड़े अन्य कार्यों की पारदर्शिता पर भी प्रश्नचिह्न लग सकते हैं।