पर्यावरण दिवस विशेष
बदलते मानसून, जलस्तर में उतार-चढ़ाव से मत्स्य उत्पादन पर पड़ा असर
पर्यावरणीय बदलावों की मार से गोबिंद सागर में सिमटी मछलियों की दुनिया
सिल्ट, मलबा डंपिंग और बदलते वर्षा चक्र से प्रभावित हुआ प्राकृतिक प्रजनन
10 साल में 1294 से 181 मीट्रिक टन पर पहुंच गया था उत्पादन
सरोज पाठक
बिलासपुर। पर्यावरण में आ रहे बदलावों का असर अब गोबिंद सागर झील की गहराइयों तक दिखाई देने लगा है। कभी प्रदेश की सबसे बड़ी कृत्रिम झीलों में शामिल गोबिंद सागर में मत्स्य उत्पादन का ग्राफ लगातार गिरता गया और 2023 में एक समय ऐसा आया जब वार्षिक उत्पादन 1294 मीट्रिक टन से घटकर महज 181 मीट्रिक टन तक सिमट गया था। लेकिन अब वैज्ञानिक स्टडी के बाद इसमें सुधार होने लगा है।
विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे बदलता मानसून, जलस्तर में लगातार उतार-चढ़ाव, सहायक नदी नालों में की गई मलबा डंपिंग, झील में बढ़ता सिल्ट जमाव और मछलियों के प्राकृतिक प्रजनन चक्र में आई बाधाएं प्रमुख कारण रहीं। विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर गोबिंद सागर झील का यह उदाहरण बताता है कि जलवायु परिवर्तन का असर केवल तापमान बढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जल स्रोतों और उनमें मौजूद जैव विविधता को भी प्रभावित कर रहा है। मत्स्य विभाग की ओर से करवाए गए वैज्ञानिक अध्ययन में सामने आया कि झील में मछलियों के प्राकृतिक प्रजनन के लिए अनुकूल परिस्थितियां लगातार प्रभावित हुई हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि पहले मानसून का एक तय चक्र हुआ करता था, लेकिन अब वर्षा का समय लगातार बदल रहा है। कई बार बारिश सामान्य समय से 15 से 20 दिन पहले या बाद में शुरू होती है। इसका सीधा असर उन प्रजातियों पर पड़ता है जो बारिश और जलस्तर के आधार पर प्रजनन करती हैं। जलस्तर में लगातार होने वाले उतार-चढ़ाव ने भी मछलियों के ब्रीडिंग ग्राउंड प्रभावित किए हैं। झील में बढ़ती सिल्ट भी बड़ी समस्या बन चुकी है। सहायक नालों और खड्डों के माध्यम से आने वाली मिट्टी धीरे-धीरे झील में जमा हो रही है। इसके अलावा आसपास डंप की गई मिट्टी और मलबा भी बरसात के दौरान बहकर जल स्रोतों तक पहुंचता है। इससे मछलियों के प्रजनन स्थल प्रभावित होते हैं। हालांकि विभाग का मानना है कि डंपिंग अकेली वजह नहीं है, बल्कि कई कारकों के संयुक्त प्रभाव से उत्पादन में गिरावट आई। वर्ष 2013-14 में गोबिंद सागर झील का मत्स्य उत्पादन करीब 1294 मीट्रिक टन था। इसके बाद उत्पादन लगातार घटता गया और मार्च 2023 में यह 181 मीट्रिक टन के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया। विभाग ने इस गिरावट के कारणों का पता लगाने के लिए भारत सरकार के एक संस्थान से अध्ययन करवाया, जिसकी रिपोर्ट वर्ष 2022 में प्राप्त हुई। रिपोर्ट में प्राकृतिक प्रजनन में कमी, हैबिटेट डिग्रेडेशन, सिल्ट, वर्षा के बदलते पैटर्न, ब्रूडर मछलियों की कमी और कुछ मामलों में ओवर हार्वेस्टिंग को भी जिम्मेदार बताया गया। अध्ययन की सिफारिशों के आधार पर विभाग ने विभिन्न सुधारात्मक कदम उठाए। इसके बाद हाल ही में समाप्त वित्तीय वर्ष में उत्पादन बढ़कर 404 मीट्रिक टन तक पहुंच गया है। बता दें कि गोबिंद सागर झील की स्थिति पर्यावरणीय बदलावों का एक महत्वपूर्ण संकेत है। यदि जल स्रोतों, सहायक नालों और प्राकृतिक प्रजनन स्थलों का संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में मत्स्य उत्पादन पर और अधिक प्रभाव पड़ सकता है। वहीं वैज्ञानिक प्रबंधन और संरक्षण उपायों से उत्पादन में और सुधार की उम्मीद भी जताई जा रही है। संवाद
कोट
गोबिंद सागर झील में जलस्तर में उतार-चढ़ाव, वर्षा के बदलते पैटर्न, सिल्ट, मलबा डंपिंग और प्रजनन स्थलों के प्रभावित होने से मत्स्य उत्पादन पर असर पड़ा है। वैज्ञानिक अध्ययन की सिफारिशों पर काम करने से अब उत्पादन में सुधार दिख रहा है।
पंकज ठाकुर, सहायक निदेशक मत्स्य, मंडल बिलासपुर