हिमाचल में वर्तमान में सेब की सैकड़ों विदेशी और देशी किस्मों को उगाया जा रहा है। इनमें दुनिया के 20 से ज्यादा देशों से अब तक 200 से ज्यादा किस्में हिमाचल पहुंच चुकी हैं। अकेले अमेरिका से ही 75 से अधिक किस्में हिमाचल आ चुकी हैं।
राज्य में मौजूदा समय में यूएसए, यूके, इजरायल, रूस, चीन, कीनिया, अर्जेंटीना, ग्रीक, जर्मनी, कनाडा, आस्ट्रेलिया, स्विट्जरलैंड, नीदरलैंड, ट्यूनीशिया, जापान, इटली, ईरान, पोलैंड, डेनमार्क, फ्रांस आदि देशों से लाई गई सेब की सैकड़ों किस्में उग रही हैं।
सेब की इन किस्मों को भारत मंगवाने का क्रम एक सदी बीते शुरू हो चुका है और यह अभी भी चल रहा है। हिमाचल की अपनी देशी किस्मों के अलावा भारत के ही पहाड़ी क्षेत्रों से एकत्र किस्में भी कई क्षेत्रों के बागवान उगा रहे हैं।
इनमें जम्मू-कश्मीर, सिक्किम, मेघालय, उत्तराखंड और तमिलनाडु (नीलगिरि) से लाई किस्में शुमार हैं। हालांकि, इनमें से सभी किस्में व्यावसायिक दृष्टि से उपयोगी नहीं हैं। व्यावसायिक नजरिए से केवल दो दर्जन किस्में ही चिन्हित हैं। इन्हीं की पैदावार सर्वाधिक होती है।
हिमाचल में सेब की रॉयल रेड डिलिशियस किस्म ही सर्वाधिक उगाई जाती है। इसका रेड गोल्डन और गोल्डन किस्मों से परागण होता है। अब सेब की लो चिंलिंग किस्में जैसे सुपर चीफ, स्कारलेट स्पर टू, रेड विलोक्स, जेरोमाइन आदि भी विदेशों से मंगवाई जा चुकी हैं। ये व्यावसायिक तौर पर बेहतर मानी जाती हैं। इनके साथ पॉलीनेशन को गेल गाला, पिंक लेडी, समर क्वीन जैसी किस्में उगाई जा रही हैं।
सरकारी स्तर या बागवान खुद मंगवा रहे
केंद्रीय कृषि मंत्रालय के राष्ट्रीय पादप आनुवांशिकी ब्यूरो शिमला कार्यालय के प्रधान वैज्ञानिक डा. जेसी राणा ने माना है कि दुनिया के 20 से ज्यादा देशों से 200 से अधिक विदेशी किस्में हिमाचल पहुंच चुकी हैं। ये या तो सरकारी स्तर पर मंगवाई गई हैं या फिर बागवान खुद भी इनका आयात कर रहे हैं। 116 तरह की देशी किस्में भी देश भर से एकत्र कर हिमाचल में छिटपुट रूप से उगाई जा रही हैं।