साढौरा। कस्बा के राजकीय स्कूल को आदर्श संस्कृति विद्यालय का दर्जा तो मिल गया, लेकिन विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए अध्यापक नहीं मिल पाए। स्कूल में शिक्षकों की कमी के कारण विद्यार्थियों की पढ़ाई चौपट हो रही है। शिक्षकों की कमी का असर ऐसा है कि विद्यालय का परिणाम 40 फीसदी तक कम हो गया है।
विद्यार्थियों को सीबीएसई पैटर्न की शिक्षा मुहैया करवाने के उद्देश्य से तीन साल पहले कस्बा के राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक स्कूल को आदर्श संस्कृति विद्यालय का दर्जा दिया था। परंतु इस दौरान केवल विद्यालय का नाम व पढ़ाई का पैटर्न ही बदला है। शिक्षकों की कमी के कारण विद्यार्थियों की पढ़ाई खराब हो रही है और अभिभावकों को उनके भविष्य की चिंता सता रही है।
आदर्श संस्कृति स्कूल में नौवीं से 12वीं के विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए पीजीटी के 30 पद स्वीकृत हैं, लेकिन इसमें से 18 पद रिक्त हैं। नौवीं से 12वीं के विद्यार्थियों का जिम्मा आधे से भी कम अध्यापकों पर है। वहीं, छठी से आठवीं के विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए टीजीटी शिक्षकों के कुल 12 पद स्वीकृत हैं। जिसमें से पांच खाली हैं केवल सात शिक्षक ही पढ़ा रहे हैं।
विद्यार्थियों की संख्या करीब 550 है। स्कूल में शिक्षकों के आधे से ज्यादा पदक रिक्त पड़े हैं। शिक्षकों की कमी का असर परीक्षा परिणाम पर नजर आ रहा है।
पहले स्कूल का दसवीं व 12वीं का परीक्षा परिणाम 70 प्रतिशत था। जो अब 40 फीसदी लुढ़क कर मात्र 30 प्रतिशत रह गया है। कई विषय ऐसे हैं, जिनका एक भी शिक्षक नहीं है, जिससे इन विषयों में विद्यार्थियों की कंपार्टमेंट आई है। शिक्षक न होने के कारण हर साल स्कूल में विद्यार्थियों की संख्या घट रही है। दो साल पहले स्कूल में 940 विद्यार्थी थे। पिछले साल इनकी संख्या घट कर कुल 750 रह गई। वहीं, इस साल स्कूल में मात्र 526 विद्यार्थी हैं। संवाद