पहले सरकारी स्कूलों के मेधावियों की पढ़ाई में आर्थिक तंगी अड़चन बनती देखी। इसी तंगी में डॉक्टर, इंजीनियर बनने जैसे ख्वाब बुन चुके मेधावी पढ़ाई बीच में छोड़ते भी देखे। ऐसे कई मेधावियों की प्रिंसिपल रहते आर्थिक दिक्कतें दूर कीं और रिटायरमेंट बाद यही जीवन का मकसद बना लिया।
हम बात कर रहे हैं सेक्टर-15 निवासी रिटायर्ड प्रिंसिपल आरएस शर्मा की। वे आर्थिक तंगी में स्कूली व उच्च शिक्षा से वंचित रहने वाले मेधावियों के सपने साकार करने को संस्था बना चुके हैं। संस्था में रिटायर्ड व मौजूदा शिक्षा अधिकारी और शिक्षक समेत विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े 110 लोगों को साथ जोड़ा गया है। रिटायर्ड प्रिंसिपल शर्मा ने बताया कि मदद के लिए मेधावियों के चयन के लिए तीन चरण रखे हैं। इसमें परीक्षा, साक्षात्कार व सरप्राइज होम विजिट है। तीनों चरण में खरे उतरने वाले मेधावियों की शिक्षा का खर्च उनकी टीम उठाएगी। गत वर्ष पांच मेधावियों से मदद की शुरुआत की, वहीं इस वर्ष भी जरूरतमंद मेधावियों के चयन के लिए परीक्षा व साक्षात्कार कराए जा चुके हैं।
उन्होंने बताया कि वे मूल रूप से पंजाब के जिला रोपड़ के गांव रामपुर से हैं। वे पांच भाई हैं, जिनकी परवरिश से पढ़ाई का जिम्मा खेतीबाड़ी कर रहे पिता पर था। उनकी आठवीं तक पढ़ाई सरकारी स्कूल से हुई। नौवीं-दसवीं निजी स्कूल से की। आर्थिक स्थिति मजबूत न देख शिमला यूनिवर्सिटी के नैना देवी संस्कृत कॉलेज से शास्त्री की, क्योंकि वहां पढ़ाई व रहने-खाने का खर्च नहीं था। इसके बाद प्रभाकर, टीचर ट्रेनिंग, व्याकरण आचार्य, एमए की।
पढ़ाई के खर्च का बोझ परिवार पर न पड़े, इसलिए साथ में जॉब भी किया। वर्ष 1986 में शिक्षा विभाग में संस्कृत शिक्षक लगे, तब भी पढ़ाई जारी रख बीएड किया। खारवन, दड़वा, सरावां व टोपरा कलांव के स्कूलों में संस्कृत पढ़ाते व प्रिंसिपल रहते अपनी तरह मेधावियों की पढ़ाई में आड़े आती आर्थिक तंगी देखी। तभी ऐसे मेधावियों की मदद की ठानी और रिटारयमेंट के बाद टीम बनाकर यह मुहिम शुरू की। संवाद