यमुनानगर। महावीर दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे दशलक्षण पर्व के चौथे दिन आर्जव धर्म के बारे में श्रद्धालुओं को बताया गया। विधानाचार्य पंडित नितिन जैन शास्त्री ने कहा कि मनुष्य को अपने भीतर सरलता के भाव, मन-वचन-काय की एकता, परिणामों की निर्मलता तथा स्वभाव से परिचय आर्जव धर्म को प्रकट करता है। उन्होंने कहा कि मनुष्यों को छोटी सी जिन्दगी में छल-कपट को स्थान नहीं देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मानव को अपने मन पर नियंत्रण रखना चाहिए, दूसरे शब्दों में जो सत्य नहीं है उसे सत्य का रूप देना पाप रूपी महागर्त है। हमारे भीतर की सरलता खो गई, आज संसार के प्राणी छल-कपट के साथ जीने के आदी हो गए हैं और बाहर से सीधे बन कर दूसरों को छलना चाहते हैं। दूसरों को धोखा देना अपने आप को ही धोखा देना है, क्योंकि धोखा खाना बुरा नहीं, धोखा देना बुरा है। कुटिलता पत्थर की उस नाव के समान है, जो हमें पतन के महासागर में डूबो देती है।
कार्यक्रम अध्यक्षता मंदिर संरक्षक गिरीराज स्वरूप जैन व प्रधान अजय जैन ने की तथा संचालन पंडित शीलचंद जैन ने किया। अजय जैन ने कहा कि वह जिन्दगी जो गिरगिट की तरह रंग बदल दें वह अच्छी नहीं होती और श्रेष्ठ इंसान इससे बचता है। अपनी जिन्दगी में प्रेम को जन्म देना चाहिए और परमात्मा के असीम आनंद व भक्ति में लीन होकर सिद्धालय को प्राप्त करना चाहिए।