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सुमित के पिता प्रताप सिंह बोले - बेटे ने जो वादा किया, उसे पूरा कर दिखाया

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ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम की जीत पर विजयी चिह्न बनाते सुमित के पिता प्रताप सिंह, भाई व ग्रामीण। स - फोटो : Sonipat
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विष्णु कुमार
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सोनीपत। भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने टोक्यो ओलंपिक में जर्मनी को हराकर 41 साल बाद पदक जीता है। खिलाड़ियों ने अपने जज्बे से कांस्य पदक जीतकर देश को गौरवशाली क्षण दिए हैं। इस टीम में कई ऐसे खिलाड़ी हैं, जो अभावों की मिट्टी में तपकर सोना बने हैं। इनमें से एक नाम टीम के मिडफील्डर सुमित का भी है। पिता प्रताप सिंह का कहना है कि बेटे सुमित ने संघर्ष को जाया नहीं जाने दिया और आज देश की झोली में पदक डालकर अपने किए वादे को पूरा कर दिखाया।
सोनीपत के गांव कुराड़ के इस युवा ने जीवन में जो संघर्ष देखा है, वह शायद ही किसी अन्य खिलाड़ी ने देखा होगा। कड़ी मेहनत से ओलंपिक तक का सफर तय करने वाले सुमित को सोनीपत का पहला पुरुष ओलंपियन हॉकी खिलाड़ी होने का गौरव मिला है।
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पुरुष हॉकी टीम भले ही अपना स्वर्ण पदक जीतने का सपना पूरा न कर पाई हो, लेकिन देश की झोली में 41 साल बाद पदक डालने के वादे को जरूर पूरा कर दिखाया। खेल प्रेमियों ने कहा कि हॉकी टीम भले ही फाइनल में न पहुंच पाई हो, लेकिन टीम के जुझारूपन ने सबका दिल जीत लिया। देश को पदक दिलाने वाली हॉकी इंडिया के मिडफील्डर सुमित किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। बड़े भाई जय सिंह व अमित ने स्वयं मजदूरी कर परिवार की जरूरतों को पूरा किया और सुमित को सदैव खेलने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्हें उम्मीद थी कि खेल के दम पर सुमित का जीवन संवर सकता है। (संवाद)
स्टिक व गेंद से अकेले करते थे अभ्यास
शुरुआती दौर में सुमित अकेले ही घंटों तक मैदान में स्टिक व गेंद के साथ अभ्यास करते रहते थे। हॉकी कोच नरेश के नेतृत्व में उन्होंने सर्वप्रथम हॉकी स्टिक थामी और स्कूल की ओर से प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू किया। एक बार गुुरुग्राम हॉस्टल के लिए ट्रायल निकले तो उनका चयन हो गया। करीब तीन वर्षों तक हॉस्टल में रहे, जिसके बाद भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) के उत्तर क्षेत्रीय केंद्र बहालगढ़ में चयन हुआ। उसके बाद सुमित निरंतर कड़ा अभ्यास करते रहे। उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
अभावों को नहीं बनने दिया कमजोरी
सुमित ने शुरू से ही अभावग्रस्त जीवन यापन किया है। उसके बावजूद सुमित ने अभावों को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। परिवार पर आर्थिक बोझ न पड़े, इसके लिए वह हॉस्टल व साई से अपने घर पर भी बहुत कम आते थे। बड़े भाई जय सिंह की शादी में भी वह अपनी खेल प्रतियोगिता के कारण शामिल नहीं हो सके थे। खेल के साथ सुमित ने होटल में काम कर परिवार को आर्थिक सहारा देने का प्रयास किया। अभावों के बीच किए गए कड़े संघर्ष का ही परिणाम है कि सुमित आज सोनीपत पुरुष हॉकी का पहला ओलंपियन बना है।
वर्ष 2016 से भारतीय टीम का हिस्सा हैं सुमित
हॉकी खिलाड़ी सुमित ने स्कूल स्तर से ही हॉकी में नाम कमाना शुरू कर दिया था, जिसके बाद उन्होंने जिला, राज्य, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में अपना जलवा बिखेरा। सुमित ने बेल्जियम, आस्ट्रेलिया, भारत, रशिया व इंग्लैंड में हुईं विभिन्न हॉकी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते हुए अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। अब ओलंपिक में पदक जीतने के बाद सुमित का सपना पूरा हुआ है।
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यह हैं उपलब्धियां
-मलयेशिया में हुए सुल्तान जौहर कप में स्वर्ण पदक प्राप्त किया।
-वर्ष 2016 में हुए जूनियर वर्ल्ड कप में स्वर्ण पदक हासिल किया।
-वर्ष 2016 में हुई इंडियन हॉकी लीग में हिस्सा लेते हुए सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का पुरस्कार प्राप्त किया।
-वर्ष 2017 में मलयेशिया में हुए सुल्तान अजलान शाह कप में कांस्य पदक जीता।
-वर्ष 2018 में सुल्तान अजलान शाह कप तथा कॉमनवेल्थ गेम्स में हिस्सा लिया।
-वर्ष 2018 में ओमान में हुई एशियन चैंपियंस ट्रॉफी में स्वर्ण पदक जीता व इसी वर्ष सीनियर वर्ल्ड कप में प्रतिभागिता की।
-वर्ष 2019 में मलयेशिया में हुए सुल्तान अजलान शाह कप में रजत पदक प्राप्त कर ओलंपिक क्वालीफाई किया।

ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम की जीत पर गांव कुराड़ में पिता प्रताप सिंह को मिठाई खिलाते सरपंच बिजे?- फोटो : Sonipat

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