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रिश्तेदारों से मदद लेकर पहुंचा विदेश पढ़ने, अब भविष्य अधर में

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यूक्रेन से लौटा सुकश पहल परिजन के साथ। संवाद - फोटो : Sonipat
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यूक्रेन के खारकीव में फंसा मेडिकल छात्र सुकश पहल अपने घर सुरक्षित पहुंच चुका है। बेटे के घर सुरक्षित पहुंचने पर परिजनों में खुशी का माहौल है। घर लौटे सुकश पहल ने यूक्रेन में युद्ध शुरू होने के बाद से वापसी तक की दास्तां बयां की। सुकश ने बताया कि रूस की सेना द्वारा लगातार की जा रही बमबारी से वे सभी विद्यार्थी घबरा गए थे। भारतीय दूतावास से भी जब कोई सहायता नहीं मिली तो लगा कि शायद अब कभी अपने वतन नहीं लौट पाएंगे। इस बीच परिजनों से संपर्क बनाए रखा और खतरे के स्थान से निकलने के लिए प्रयत्न करते रहे। शनिवार को वे अपने घर तो पहुंच गए हैं, लेकिन भविष्य की चिंता सता रही है। परिजनों ने रिश्तेदारों से मदद लेकर मुझे पढ़ने विदेश भेजा था। यूक्रेन पर रूस द्वारा हमला करने के कारण हमारा भविष्य ही अधर में लटक गया है।
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सुकश पहल ने बताया कि वह 2020 में मेडिकल की पढ़ाई करने खारकीव शहर गया था। 23 फरवरी से वहां हमले शुरू हो गए थे। धमाकों से वह काफी डर गए। जिसके बाद कई दिनों तक बंकर में रहे और बिस्कुट, चॉकलेट व मैगी खाकर गुजारा किया। पीने के पानी की उनके सामने सबसे बड़ी समस्या रही। सुकश ने बताया कि हमारे ग्रुप में 20 विद्यार्थी थे, सभी किसी तरह 1 मार्च को टैक्सी से दोगुना अधिक पैसे देकर रेलवे स्टेशन पहुंचे। स्टेशन पर पहले स्थानीय नागरिकों को ट्रेन में चढ़ाया जा रहा था। वहां की पुलिस ने ट्रेन में चढ़ने का प्रयास कर रहे भारतीय छात्रों के साथ मारपीट भी की। वे लोग किसी तरह ट्रेन में चढ़कर 18 घंटों का सफर तय कर यूक्रेन के लिवीव शहर पहुंचे, जिसके बाद वहां से टैक्सी लेकर 2 मार्च को पोलैंड बॉर्डर पर पहुंचे। वहां पर भी पहले यूक्रेन के लोगों को निकाला जा रहा था। 3 मार्च को वह पोलैंड के रीजीजो शहर पहुंचे। सुकश पहल ने बताया कि उन्होंने कई बार भारतीय दूतावास को फोन किया, लेकिन उनकी तरफ से सहायता नही की गई। वह खुद ही प्रयास कर पोलैंड पहुंचे। जिसके बाद दूतावास के सदस्य उनको लेकर आए।
सुकश पहल के पिता रमेश पहल ने बताया कि मैं कांट्रेक्ट बेस पर दमकल विभाग में बतौर चालक कार्यरत हूं। हमारी आर्थिक स्थिति कमजोर है। बेटा शुरू से ही पढ़ाई में होनहार रहा है। मेरा सपना था कि बेटा बड़ा होकर डॉक्टर बने, लेकिन आर्थिक स्थिति कमजोर थी। जिस कारण सुकश अपने मामा के पास रहने लगा और वहीं से आठवीं कक्षा के बाद आगे की पढ़ाई शुरू की। विदेश तक पहुंचने में उसके मामा का काफी सहयोग रहा है। मैंने रिश्तेदारों से पैसे लेकर किसी तरह अपने बेटे को यूक्रेन भेजा, लेकिन अब उन्हें अपने बेटे के भविष्य की चिंता सताने लगी है।
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फीस में बड़ा अंतर, इसलिए जाते हैं विदेश
सुकश पहल ने बताया कि देश के मुकाबले यूक्रेन में मेडिकल की पढ़ाई बेहतर व कम खर्च पर होती है। एक साल की सबसे अच्छे कॉलेज की फीस 3 लाख के करीब है, जबकि हमारे यहां पहले नीट के पेपर के लिए 20 लाख बच्चे आवेदन करते हैं और उनमें से 20 हजार लोगों को मौका मिलता है। वहीं निजी महाविद्यालय में दाखिला लेने के लिए लाखों रुपये डोनेशन के तौर पर देने पड़ते हैं, जबकि यूक्रेन में विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ अभ्यास भी बेहतर ढंग से कराया जाता है।
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