पहले भगवान ने मेरा पति छीन लिया और अब निजी स्कूल मासूम बेटी से शिक्षा का अधिकार छीन रहे हैं। दो महीने से बेटी को दाखिला दिलवाने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रही हूं, न्याय मिलेगा या नहीं, इसका भी पता नहीं। निजी स्कूलों में जाकर अपनी व्यथा बता चुकी हूं। उपायुक्त, अतिरिक्त उपायुक्त, जिला शिक्षा अधिकारी के कार्यालय में प्रदर्शन कर चुकी हूं।
सीएम विंडो पर भी शिकायत दे चुकी हूं, लेकिन बेटी को शिक्षा का अधिकार नहीं दिला पाई। भगवान ऐसी दुविधा में किसी को न फंसाएं। यह कहना है हरियाणा के सोनीपत की खन्ना कॉलोनी निवासी किरण का, जो तीसरी कक्षा में पढ़ने वाली मासूम बेटी को दाखिला दिलवाने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रही है।
किरण ने नम आंखों से अपनी दुखभरी दास्तां बताते हुए कहा कि मैं पानीपत की रहने वाली हूं। वर्ष 2012 में मेरी शादी सोनीपत की खन्ना कॉलोनी निवासी धीरज के साथ हुई थी। धीरज बिजली बोर्ड में डीसी रेट पर कार्यरत थे। शादी के बाद मेरी दो बेटियां हुईं। बड़ी बेटी आज तीसरी कक्षा में तो छोटी बेटी पहली कक्षा में है। जब तक पति थे, तब तक जैसे-तैसे घर का गुजारा चल रहा था। वर्ष 2018 में मेरे पति का निधन हो गया।
उसके बाद से कमाई का जरिया बंद हो गया। घर का खर्च चलाना भी मेरे लिए मुश्किल हो गया। ऐसे में निजी स्कूल की महंगी फीस कैसे भर पाती। सरकार ने इस बीच शैक्षणिक पत्र के बीच में नियम 134ए के तहत आवेदन निकाले। बेटियों को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए बड़ी बेटी का फॉर्म भर दिया।
पढ़ने में होशियार होने के कारण बेटी ने मूल्यांकन परीक्षा भी पास कर ली। आवेदन में मैंने बेटी के लिए पहला स्कूल लिटल एंजल्स चुना था। अच्छे अंक होने के कारण बेटी को स्कूल भी अलॉट हो गया, लेकिन स्कूल ने दाखिला देने से इनकार कर दिया।
दो साल से बेटियों को घर पर ही रखकर पढ़ाने का कर रही हूं प्रयास
मेरी बेटियां पहले जानकीदास स्कूल में पढ़ती थीं। नियम 134ए के तहत आवेदन करने के बाद एसएलसी निकलवाने के लिए स्कूल गई। स्कूल ने बकाया फीस का भुगतान करने की बात कही। हालांकि बाद में मेरी दुखभरी दास्तां सुनने के बाद फीस में कुछ रियायत दे दी थी। जिसके बाद मैंने उधार पैसे लेकर फीस भरकर एसएलसी निकलवाया और लिटल एंजल्स स्कूल में दाखिला दिलवाने पहुंची। यहां स्कूल ने नियम 134ए के तहत किसी भी बच्चे को दाखिला देने से इनकार कर दिया। दो महीने से बेटी को शिक्षा का अधिकार दिलाने के लिए दर-दर की ठोकरें ही खा रही हूं।
सरकार से लगी है आस
किरण ने बताया कि मैं अपनी दोनों बेटियों को अच्छी शिक्षा दिलवाकर अपने पैरों पर खड़ा करना चाहती हूं, ताकि भविष्य में इन्हें किसी प्रकार की परेशानी न झेलनी पड़े। पति की मौत के बाद जो पैसा मिला था, उससे ही अब तक स्कूल की फीस व घर का खर्च चला रही थी। अब वह भी खत्म हो गया है। विधवा पेंशन के सहारे ही अपना जीवन यापन कर रहे हैं। नियम 134ए के तहत बेटी का नंबर आने पर हल्की सी उम्मीद जगी थी, लेकिन अब वह भी धुंधली होती जा रही है। बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ का नारा देने वाली सरकार से आस है कि मेरी बेटियों को भी बेहतर शिक्षा दिलवाने में मेरी सहायता करेगी।