सोनीपत की विरासत को संभालने के लिए बनाया गया स्वर्णप्रस्थ संग्रहालय।
- फोटो : Sonipat
सोनीपत जिले को 22 दिसंबर,1972 को बनाया गया था। म्हारा सोनीपत अपने जीवन के 49 बसंत देखने के बाद लगातार बेहतरी की तरफ बढ़ता जा रहा है। जन्म के बाद से ही सोनीपत ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। आज शिक्षा के हर स्वरूप में जिले का कोई सानी नहीं है। शिक्षा के साथ ही खेलों में भी सोनीपत का नाम अग्रणी रूप से लिया जाता है। राजनीति के पटल पर भी सोनीपत के कई बाशिंदों ने अपनी छाप छोड़ी है और आगे भी जिले का नाम रोशन करेंगे।
जिले को इतिहास में स्वर्णप्रस्थ के नाम से जाना जाता था। तब से अब तक लोगों ने जिले को प्रगति की बुलंदी पर पहुंचाया है। प्रदेश का गठन 1 नवंबर, 1966 को हुआ था। प्रदेश के गठन के बाद रोहतक जिले से अलग कर वर्ष 1972 में सोनीपत जिला बनाया गया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी बंसीलाल ने 22 दिसंबर को सोनीपत को नया जिला बनाया था। हालांकि तब किसी ने सोचा भी नहीं था कि इतनी जल्दी सोनीपत विश्व पटल पर गहरी छाप छोड़ेगा, लेकिन सोनीपत लगातार देश और विदेश में अपनी प्रगति की नई कहानी लिखता चला गया।
सोनीपत नगरपालिका से अब नगर निगम बन चुका है। खेल और शिक्षा के दम पर देशभर में जिले की अलग ही पहचान बन चुकी है। इतना ही नहीं खेलों का नाम आते ही सोनीपत सभी की जुबान पर आ जाता है। ओलंपिक व पैरालंपिक तक में जिले के खिलाड़ियों ने झंडे गाड़े हैं।
पांडवों ने मांगा था सोनीपत
सोनीपत का नाम पुराणों में भी है। पांडवों ने कौरवों से युद्ध न करने की एवज में जो पांच गांव मांगे थे, उनमें सोनीपत भी था, जिसे उस समय स्वर्णप्रस्थ कहा जाता था।