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कुंडली बॉर्डर पर डटीं पंजाब के किसानों की तीन पीढ़ियां

Tue, 08 Dec 2020 06:55 AM IST
रोहतक ब्यूरो अमर उजाला नेटवर्क, सोनीपत
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विरोध की खातिर... - फोटो : amar ujala
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केंद्र सरकार के कृषि कानूनों को रद्द कराने को मांग को लेकर पंजाब और हरियाणा के साथ देश के अन्य प्रदेशों के किसान भी कुंडली बॉर्डर पर डटे हुए हैं। किसानों के आंदोलन का नेतृत्व कर रहे पंजाब के किसानों की तो तीन पीढ़ियां आंदोलन में कूद चुकी है। कुंडली बॉर्डर पर दस साल के बच्चे लेकर 90 साल तक के बुजुर्ग धरने में अपनी पूरी हिस्सेदारी दे रहे हैं। आंदोलन में शामिल लोगों का कहना है कि वह अपनी मांगों को हर हाल में पूरा कराएंगे। यह पहला आंदोलन है जिसमें लगातार लोग जुड़ रहे हैं। बच्चे और बुजुर्ग भी पीछे नहीं हैं।

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कुंडली बॉर्डर से प्रीतमपुरा तक हाईवे पर टैक्टर-ट्राली व अन्य वाहनों की कतार लगी है। पंजाब से आए आंदोलनकारियों ने ट्रैक्टर-ट्रालियों को ही कमरों का रूप दे रखा है। उनके अंदर ही किसानों की तीन पीढ़ियां ठहरी हुई है। ट्रैक्टर-ट्रालियों में सवार बुजुर्ग से लेकर बच्चों तक की जुबान पर ही एक ही बात है कि अब तो वह कृषि कानूनों को रद्द कराकर ही वापस जाएंगे। बुजुर्ग और बच्चे सभी के अंदर अपनी खेती-किसानी बचाने की लालसा है। किसानों का कहना है कि वह अपनी लड़ाई को खुद लड़ रहे हैं। अब वह पीछे तभी हटेंगे जब उनकी मांगों को पूरा कर दिया जाएगा।

परिजन भी घर से बढ़ा रहे हौसला
किसानों का कहना है कि पंजाब में उनके घर बैठे परिजन भी उनका हौसला बढ़ा रहे हैं। यहीं कारण है कि बुजुर्गों व बच्चों को भी आंदोलन में शामिल होने के कारण कुंडली बॉर्डर पर भेज दिया है। किसान कहते हैं कि वह तो छह महीने का राशन लेकर आए हैं और आगे भी जरूरत पड़ी तो राशन यहां मंगवाया जाएगा। लंबे समय बाद ऐसा हो रहा जब किसान अपनी मांगों को लेकर घर से निकल चुका है। इस आंदोलन में सभी जाति और धर्म के लोग शामिल हैं। किसान परिवारों के युवा, बुजुर्ग, बच्चे और महिलाएं भी हैं।
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किसान ने नहीं सुनी तो दिल्ली का रुख किया
किसानों का कहना है कि उन्होंने पंजाब में लगातार धरना-प्रदर्शन कर अपने आंदोलन को जारी रखा, लेकिन सरकार ने उनकी नहीं सुनी। आखिर में उन्हें दिल्ली के निकलना पड़ा। रास्ते में किसानों को रोकने के लिए हरसंभव प्रयास किया गया लेकिन युवा किसानों ने बुजुर्गों का साथ पाकर हर मंजिल को पार आया और अब दिल्ली के सीने पर आकर बैठ गए हैं। यहां से तभी जाएंगे जब सरकार उनकी मांगों को पूरा कर देगी।

दादा और चाचा के साथ आंदोलन में शामिल
किसानों के आंदोलन में शामिल होने अपने दादा 78 साल के बलविंद्र सिंह के साथ आए 13 वर्षीय दिलबाग सिंह कहते हैं कि वह अपने दादा के साथ 25 नवंबर को किसान आंदोलन में शामिल होने के लिए अमृतसर से चला था। उसने कहा कि कृषि कानून किसानों के अस्तित्व को प्रभावित कर सकते हैं। जिन्हें रद्द कराने के लिए अपने दादा व चाचा के साथ मिलकर यह लड़ाई लड़ रहा हूं। दलबीर सिंह ने बताया कि वह अपने ट्रैक्टर में बैठकर ही पढ़ाई करता है और पढ़ाई करने के बाद किसानों के बीच जाकर अपने आंदोलन को सफल बनाने की पहल करता है। किसान बलविंद्र सिंह ने कहा कि पहले युवा आंदोलन के लिए आने की रणनीति बना रहे थे। तभी हम बुजुर्गों ने कह दिया था कि वह भी चलेंगे। उन्होंने कहा कि केंद्र की मोदी सरकार को तुरंत फैसला लेकर किसानों की मांगों को पूरा कर देना चाहिए। किसान जायज मांगों को लेकर चल रहे और अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं।

बेटे और 10 साल के भतीजे के साथ पहुंचा किसान
पंजाब के जालंधर से अपने बेटे और 10 साल के भतीजे के साथ आए गुरिंद्र सिंह बताते हैं कि वह 26 नवंबर से यहां डटे हुए है। किसानों का आंदोलन है तो पूरे परिवार के साथ इसे सफल बनाने में लगा हूं। सरकार को चाहिए कि वह किसानों को निराश न करें। सरकार किसान के हित की बात करती है तो जमाखोरी के कानूनों को तुरंत रद्द कर दें। अगर सरकार किसानों के लिए कुछ करना चाहती है तो एमएसपी को लागू करें। तभी किसान वापस जाएगा। वरना किसान बच्चों व महिलाओं सहित डटा रहेगा।

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