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देसी कपास पर सफेद मक्खी का असर कम

Tue, 09 Feb 2016 01:32 AM IST
अमर उजाला सिरसा/ब्यूरो
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कपास की फसल में बीमारियों से चिंतित इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर ने बीमारियों की रोकथाम के लिए देश भर के वैज्ञानिकों से मंत्रणा के लिए सेमिनार का आयोजन किया है।
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हालांकि कई देशों के वैज्ञानिक सफेद मक्खी की बीमारी की रोकथाम के लिए उपाय ढूंढने में पहले से ही जुटे हुए हैं पर किसानों का कपास की खेती से मोह भंग होता देख कर देश के वैज्ञानिकों ने कसरत को और तेज कर दिया है।

इस बार बीमारियों के कारण कपास की फसल 50 से 70 फीसदी क्षतिग्रस्त हो गई थी जिस कारण किसानों ने इस फसल से तौबा कर ली है।

अब भारतीय कपास अनुसंधान केंद्र द्वारा बीमारियों के कम प्रभाव में आने वाली किस्मों पर शोध की जा रही है ताकि किसानों को ऐसी किस्मों की बिजाई की सिफारिश की जाए जिनमें बीमारियां कम आएं।
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इसी कड़ी में सिरसा के केंद्रीय कपास अनुसंधान केंद्र में सोमवार को राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया। सेमिनार के शुभारंभ अवसर पर सीआईसीआर के अध्यक्ष डॉ. दलीप मोंगा ने सभी वैज्ञानिकों का विधिवत स्वागत किया। 

सेमिनार में उपस्थित वैज्ञानिकों को संबोधित करते हुए इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च के डीडीजी डॉ. जीत सिंह संधू ने कहा कि देसी कॉटन की फसल सफेद मक्खी की बीमारी से पूर्ण रूप से सुरक्षित है जो कि विभिन्न प्रकार के शोध से साबित हो चुका है तथा इसके अधिक से अधिक प्रयोग के लिए केंद्रीय कपास अनुसंधान केंद्र द्वारा बढ़ावा देने के लिए किसानों को जागरूक भी किया जा रहा है।

यहां राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के तहत आयोजित एक दिवसीय सेमिनार में अनपे संबोधन में डॉ. संधू ने बताया कि जिस प्रकार से वर्ष 2007-08 में कपास में मिलीबग की बीमारी से फसल चौपट हो गई थी और उसका जड़ से नाश करने के लिए हरियाणा, पंजाब व राजस्थान के कृषि वैज्ञानिकों ने दिन रात एक कर शोध किए थे, उसी प्रकार गत वर्ष 2015 में सफेद मक्खी के प्रकोप से नष्ट हुई फसल के कारण किसानों को हुए नुकसान को देखते हुए एक बार फिर इन तीनों राज्यों के कृषि वैज्ञानिक शोध कर रहे हैं तथा उम्मीद है कि जल्द ही इस बीमारी का भी जड़ से खात्मा करने में सफलता हासिल कर ली जाएगी।

इसी उद्देश्य के लिए आज उक्त सेमिनार का आयोजन किया गया है। उन्होंने बताया कि देसी कॉटन का बाजार मूल्य भी ठीक है।

उन्होंने बताया कि फसलों में बीमारी का आंकलन करने तथा उसके समाधान के लिए सीसीआर को नोडल सेंटर बनाया गया है, जिनके अधिकारी संबंधित क्षेत्रों के किसानों को उनके मोबाइल पर बीमारी के कारण तथा उसकी रोकथाम के लिए समय-समय पर सुझाव देंगे। इसके अतिरिक्त प्रत्येक माह रिव्यू मीटिंग भी आयोजित करने का भी निर्णय लिया गया है।

किसानों को फसलों की बीमारी व उसके नष्ट होने से होने वाले आर्थिक नुकसान से बचाव के लिए पौधे की सुरक्षा से संबंधित सलाह, पेस्टीसाइड की नियमित जांच, फसलों के व्यवस्थित प्रबंधन के लिए लाइव डेमोस्ट्रेशन देने, कीटनाशकों के उपयोग से संबंधित तकनीक, नाइट्रोजन के प्रयोग आदि के संबंध में भी समय-समय पर सुझाव दिए जाएंगे।

उन्होंने यह भी बताया कि केंद्रीय कपास अनुसंधान द्वारा किसानों के हित में गुणवत्तापरक बीज, पेस्टीसाइड व इंसेक्टीसाइड की सिफारिशें की जाएंगी ताकि उनका प्रयोग कर किसान फसलों को बीमारियों से सुरक्षित रख सकें।

इसके अतिरिक्त प्रत्येक प्रत्येक गांव में एक कार्यक्रम का भी आयोजन करने का प्रावधान रखा गया है, जिसके तहत वहां की फसलों का सर्वे किया जाएगा और किसानों को बीमारियों व उनके समाधान के उपाय बताए जाएंगे।

सेमीनार में डॉ. एएच प्रकाश, डॉ. के आर क्रांति, डॉ. एसएस सिवाच, डॉ. बलविंद्र, डॉ. सी चटोपाध्याय, डॉ. दलीप मोंगा, डॉ. ऋषि कुमार, डॉ. आरए मीणा, डॉ. वाईपी सिंह, डॉ. लक्ष्यवीर बैनीवाल, डॉ. आत्माराम गोदारा, राजेंद्र शेरडिय़ा, बृजलाल सहित सभी केवीके इंचार्ज आदि उपस्थित थे।

मौसम के कारण पनपी सफेद मक्खी की बीमारी: डॉ. सुशील
भारत सरकार के पौधा संरक्षण सलाहकार डा. एसएम सुशील ने सेमिनार में उपस्थित वैज्ञानिकों को संबोधित करते हुए कहा कि कपास व नरमा की फसल में सफेद मक्खी जैसी खतरनाक बीमारी के पनपने का मुख्य कारण देरी से बिजाई करना तथा मौसम का प्रतिकूल होना रहा है।

यह निष्कर्ष कृषि वैज्ञानिकों द्वारा सफेद मक्खी के पनपने के कारणों पर किए गए शोध में निकला है। उन्होंने यह भी कहा कि किसानों द्वारा इसकी रोकथाम के लिए सीआईसीआर द्वारा सुझाव की जगह पेस्टीसाइड डीलर द्वारा दी गई सलाह के अनुसार कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग किया गया, जो इस बीमारी के बढ़ने का मुख्य कारण रहा।

उन्होंने बताया कि केंद्रीय कपास अनुसंधान केंद्र द्वारा विभिन्न प्रकार की फसली बीमारियों से सुरक्षा के लिए 35 प्रकार की कीटनाशकों का सुझाव दिया गया है, लेकिन देखा गया है कि अधिकतर किसान जागरुकता के अभाव में इनका प्रयोग ही नहीं करते, जिससे उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।

उन्होंने बताया कि यह भी देखा गया है कि बिजाई के दौरान किसान गुणवत्तापरक बीज का प्रयोग नहीं करते। केवल बीज विक्रेताओं के कहने पर साथी किसान से सलाह मशविरा कर बीज उठा लाते हैं, जिसका भी नुकसान किसानों को उठाना पड़ता है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कहा कि पंजाब में गत वर्ष फसलो के सैंपल लिए गए थे, जिसमें से करीब 80 प्रतिशत सैंपल फेल पाए गए अर्थात खराब बीजों का प्रयोग किसानों द्वारा किया गया।

सेमीनार में उपस्थित भारत सरकार की सलाहकार समिति के कृषि आयुक्त डॉ. एसके मल्होत्रा ने कहा कि सफेद मक्खी के लिए प्रत्येक जिला की मृदा की प्रक्रिया के आधार पर रणनीति बनाई जा रही है, जिसके तहत किसानों को ट्रेनिंग दी जाएगी और उनकी जिम्मेदारियां तय की जाएंगी।

सफेद मक्खी के प्रकोप को देखते हुए हाईब्रीड बीजों की सिफारिश की जाएगी तथा दवाओं व खाद का कब और कितनी मात्रा में प्रयोग किया जाना है, स्प्रे के लिए किसी प्रकार की तकनीक अपनानी चाहिए, इसके संबंध में मैसेज कर किसानों को अवगत करवाया जाएगा।

उन्होंने कहा कि इस सेमीनार में इन्हीं सब मुद्दों पर हरियाणा, पंजाब व राजस्थान के कृषि वैज्ञानिकों पर सुझावों के आदान-प्रदान के लिए विचार विमर्श किया जाएगा ताकि कपास की फसल को बढावा दिया जा सके।
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