जिले के राजकीय प्राथमिक स्कूलों के हाल बेहाल हैं। स्कूलों की स्थिति देखकर लगता है कि सरकार के करोड़ों खर्च करना और सर्व शिक्षा अभियान प्रयास जमीनी स्तर तक नहीं पहुंच पा रहा है। स्कूलों में अध्यापक से लेकर भूलभूत सुविधाओं का टोटा है। हालांकि जिले में 524 प्राथमिक स्कूल हैं, जिनमें वर्ष 2015 तक 65 हजार बच्चे पढ़ते थे। लेकिन वर्ष 2016 में प्राथमिक स्कूलों में सुविधाओं के टोटे को दिखते हुए करीब चार हजार बच्चों ने प्राथमिक स्कूलों में आना बंद कर दिया। जिस वजह से प्राथमिक स्कूलों में बच्चों की संख्या 61 हजार 131 तक में सिमट गई है। ये संख्या भी सिर्फ रजिस्टरों में दर्ज है, जबकि असल में इसके आधे बच्चे भी प्राथमिक स्कूलों में नजर नहीं आते। इसका कुछ हद तक कारण प्राथमिक स्कूलों में स्टाफ की कमी है। जिले भर के प्राथमिक पाठशालाओं में 459 पद खाली पड़े हैं। सर्व शिक्षा अभियान योजना के बावजूद बच्चे राजकीय प्राथमिक स्कूलों में आने से क्यों कतरा रहे हैं। ये जानने के लिए राजकीय प्राथमिक पाठशाला नंबर एक का शुक्रवार को अमर उजाला की टीम ने हाल जाना।
पेड़ के नीचे लगती है कक्षाएं
शहर के नोहरिया बाजार में शनिदेव मंदिर के सामने वाली गली में स्थित है राजकीय प्राथमिक पाठशाला नंबर एक। पाठशाला में प्रवेश करते ही यहां बच्चे पेड़ की छांव में दरी बिछाकर शिक्षा का प्राथमिक ज्ञान लेते दिखाई दिए। इस नंबर वन पाठशाला में पहली से लेकर पांचवीं कक्षा तक बच्चे शिक्षा ग्रहण करते हैं। शिक्षा विभाग ने वैसे तो यहां दो कमरे बनाए हुए हैं, लेकिन पांच कक्षाएं दो कमरों में कैसे चल सकती है इसलिए मजबूर पेड़ के नीचे पाठशाला लगाई जाती है। पाठशाला में महज चार टीचरों की नियुक्ति है और इनमें से भी कोई न कोई टीचर बच्चों को पढ़ाने के नये तौर तरीके सिखने के लिए कैंप में भाग लेने चला जाता है और बच्चे कई दिनों तक उसका इंतजार करते रहे हैं। स्कूल में चपरासी और चौकीदार नहीं इसलिए सारे काम टीचरों को खुद ही करना पड़ता है। मुख्य अध्यापक का पद पिछले कई सालों से खाली पड़ा है और इंचार्ज का अतिरिक्त पदभार अध्यापिका गीता खत्री ने संभाल रखा है। उन्होंने बताया कि स्कूल में बच्चों की संख्या 112 है लेकिन करीब 82 बच्चे ही स्कूल आ रहे हैं। बच्चों को कंप्यूटर शिक्षा देने के लिए एजूसेट का सारा सामान अलमारी में पड़ा हुआ धूल फांक रहा है, क्योंकि पाठशाला में कंप्यूटर रूम नहीं बनवाया जा रहा। ऐसे में यह कैसा मजाक है जो पढ़ना चाहता है उसके पास पर्याप्त सुविधाएं भी मौजूद नहीं हैं। सर्व शिक्षा अभियान चलाकर देश को शिक्षित बनाने की बात की जाती है, लेकिन ऐसे हालात में बच्चे कैसे पढ़ेंगे?
समाज सेवकों ने की ठंडे पेयजल की व्यवस्था
पाठशाला में बच्चे टंकी का पानी पीते थे। गर्मी के समय टंकी का पानी इतना गर्म हो जाता था कि बच्चे उसे हाथ तक नहीं लगा पाते थे। ऐसे में इंचार्ज गीता खत्री ने व्यक्तिगत तौर पर बच्चों के लिए ठंडे पानी की व्यवस्था की। उनके पति ने उनका सहयोग करते हुए समाज सेवकों से सहायता लेकर पाठशाला में वाटर कूलर लगवाया। बच्चों को कंप्यूटर शिक्षा देने के लिए एजूसेट का सारा सामान अलमारी में पड़ा हुआ धूल फांक रहा है क्योंकि पाठशाला में कंप्यूटर रूम नहीं बनवाया जा रहा।
जुगाड़ के सहारे चल रही है बिजली
पाठशाला की पुरानी इमारत कंडम घोषित की जा चुकी है और नये निर्मित दो कमरों मेें शिक्षा विभाग की तरफ से बिजली फिटिंग तक नहीं करवाई गई। अध्यापकों ने खुद ही जुगाड़ करके बिजली की तार कमरे तक पहुंचाई है ताकि बच्चे गर्मी से परेशान न हों। कंडम भवन जो कभी भी गिर सकता है उसकी छत तले मिड-डे मिल तैयार करके बच्चों को परोसा जाता है। ऐसे में अगर कंडम इमारत का गिरी तो बड़ा हादसा हो सकता है।
मोबाइल में ज्यादा बीजी रहते हैं टीचर
पेड़ के नीचे क्लास में बैठे बच्चों से बातचीत की तो उन्होंने बताया कि वे रोज सुबह टाइम पर स्कूल आते हैं। इस समय तक मास्टर जी कभी आते हैं कभी नहीं आते ,जब मास्टर जी होते हैं तो सभी बच्चों को एक साथ बैठा कर लिखने को दे देते हैं और खुद देर तक मोबाइल में बिजी रहते हैं।
मूलभूत सुविधाओं पर ध्यान दे सरकार
जिले ही नहीं प्रदेश भर का में ही यही हाल है। राजकीय पाठशालाओं में मूलभूत सुविधाएं होना अति आवश्यक होता। पर्याप्त संख्या में भवन, शुद्ध पेयजल व्यवस्था, बैठने को बेंच, बिजली व्यवस्था और पर्याप्त संख्या में अध्यापकों की नियुक्ति होनी चाहिए। शहर से ज्यादा ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति खराब है। वहां बिजली जाने पर गर्मी से बच्चों का बुरा हाल हो जाता है। अध्यापक अपने स्तर पर कुछ प्रबंध कर लेते है लेकिन शिक्षा विभाग कोई ध्यान नहीं देता। सुविधाओं के अभाव के चलते बच्चों का राजकीय प्राथमिक पाठशालाओं से मोह भंग होने लगता है। सरकार को मूलभूत सुविधाओं पर ध्यान देना चाहिए।
गुरदीप सैनी, प्रदेश मीडिया प्रभारी, हरियाणा राजकीय अध्यापक संख्या।
लोकल प्रशासन व निदेशक समक्ष मुद्दा उठाया है
इसमें कोई दोराय नहीं की सुविधाओं के अभाव में बच्चों का राजकीय विद्यालयों से मोह भंग हो रहा है। टीचरों की संख्या बहुत कम है, जल्द से जल्द इन्हें भरना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल टाइम के दौरान मात्र एक घंटा लाइट रहती है। हर स्कूल में वाटर कूलर लगाए जाने चाहिए, बहुत से स्कूलों में इसका प्रबंध नहीं है। इसके अलावा कंप्यूटर सिस्टम पर्याप्त सुविधा नहीं होने के चलते धूल फांक रहे हैं। मैंने अपने स्तर पर व्यवस्था सुधारने की दिशा में प्रयास शुरू किया है। लोकल प्रशासन और विभाग के निदेशक समक्ष वीरवार को चंडीगढ़ में मैंने यह मुद्दा उठाया था। उम्मीद है धीरे-धीरे सुधार शुरू हो जाएगा।
डॉ. यज्ञदत्त वर्मा, जिला मौलिक शिक्षा अधिकारी, सिरसा।