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उम्मीद की मशाल : गांव शेखपुरा के कमजोर विद्यार्थियों को तलाशने में जुटी निशा रानी

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बच्चों को पढ़ाती शेरपुरा की निशा। संवाद - फोटो : Sirsa
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अनुपमा जाखड़
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सिरसा। कहते हैं यदि कुछ करने का जज्बा और जुनून हो तो कोई मुश्किल आपका रास्ता नहीं रोक सकती। ऐसा ही शेरपुरा की निशा (20) रानी ने ठान लिया कि गांव के किसी भी बच्चे को संसाधन के अभाव में पढ़ाई में कमजोर नहीं रहने दिया जाएगा। इसी उद्देश्य को साथ लेकर उसने घर के आंगन में उसने गांव के बच्चों को निशुल्क पढ़ाना शुरू कर दिया।
गांव के गरीब परिवारों के बच्चे महंगी शिक्षा हासिल नहीं कर सकते। इस कारण वे दूसरे बच्चों के मुकाबले पढ़ाई में पिछड़ जाते हैं। इस बात का अंदाजा केवल उसी व्यक्ति को होता है, जो स्वयं इसे व्यक्तिगत रूप से देखकर महसूस करे। ऐसा ही हुआ गांव शेरपुरा की निशा के साथ। यहीं से उन्होंने इस स्थिति को बदलने की ठान ली है। अब निशा ने अपने घर के आंगन में ही गांव के गरीब परिवारों के छोटे बच्चों के लिए नि:शुल्क ट्यूशन क्लास शुरू की है। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद न केवल स्वयं बीए की पढ़ाई कर रही है, बल्कि छोटे बच्चों के लिए भी प्रयासरत है। संवाद
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ऐसे आया आइडिया और ले लिया फैसला
निशा बताती है कि वह डीएड का कोर्स कर रही है। इस दौरान उनकी इंटर्नशिप (प्रशिक्षण) राजकीय विद्यालय में लगी। ट्रेनिंग के दौरान उन्होंने देखा कि राजकीय विद्यालय के बच्चे पढ़ाई में कमजोर हैं। इनमें से अधिकतर बच्चे उसी के गांव शेरपुरा के थे। इसका मुख्य कारण ये था कि संसाधनों के अभाव में महंगी ट्यूशन नहीं ले पाना था। इस पर निशा ने फैसला किया कि वह अपने गांव के बच्चों को नि:शुल्क ट्यूशन देगी। इसके लिए निशा ने अपने घर के आंगन में ही पढ़ाना शुरू कर दिया। निशा के पास दसवीं तक के करीब 20 बच्चे नियमित रूप से पढ़ने के लिए आते हैं।
कोरोना काल से मिला सबक
निशा बताती हैं कि डीएड की ट्रेनिंग होते ही कोरोना काल आ गया। ऐसे में सभी शिक्षण संस्थान बंद हो गए। मोबाइल से शिक्षा देने का फैसला लिया गया, लेकिन गांव के बच्चों के पास मोबाइल भी नहीं थे। ऐसे में निशा ने बिना मोबाइल के बच्चों को पढ़ाया। निशुल्क शिक्षा देने की सोच को और भी अधिक बढ़ावा दिया और बच्चों के साथ संपर्क साधकर निशा ने उन्हें घर पर बुलाकर शिक्षा देनी शुरू की।
प्रतिदिन शाम तीन घंटे कराती हैं पढ़ाई
निशा के घर प्रतिदिन दोपहर बाद करीब तीन घंटे की नि:शुल्क ट्यूशन लगाई जाती है। ऐसे में बच्चों की रौनक उनके घर में रहती है। निशा ने बताया कि शाम को बच्चे साढ़े 4 बजे आने लग जाते हैं। वहीं, शाम को करीब साढ़े 7 बजे तक पढ़ते हैं। इसमें से किसी का समय फिक्स नहीं है। जिसका जिस समय में काम हो जाता है उस समय में वो चला जाता है।
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वर्जन
हमें हमारी ऐसी बच्ची पर गर्व है, जो बच्चों को निशुल्क शिक्षा प्रदान कर रही है। हम चाहते हैं कि निशा जैसी बच्ची जो स्कूल को लीड करती है, वह स्कूल के बाद अपने गांव व शहर को भी लीड करे। ये एक अच्छी पहल है। बाकी बच्चों को भी आगे आना चाहिए, ताकि गांवों में भी शिक्षा का स्तर सुधर सके। - जनराज शर्मा, प्राचार्य, राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, शेरपूरा।
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