रोहतक। शहर में बाल अधिकारों के प्रति जिम्मेदार अधिकारी कितने फिक्रमंद हैं, इसका अंदाजा पीजीआई के वार्ड 14 के 15 नंबर कमरे में भर्ती दो बच्चों को देखकर आसानी से लगाया जा सकता है। इन बच्चों के सिर से बाप का साया चार माह पहले ही उठ चुका है, जबकि इनकी मां की मौत एक हादसे में बुरी तरह से जलने के आठ दिन बाद 30 नवंबर शनिवार को पीजीआई में हो गई। मां की मौत को लगभग 48 घंटे हो चुके हैं लेकिन इन बच्चों को संरक्षण मिलना तो दूर प्रशासन ने अभी तक कोई कार्रवाई तक शुरू नहीं की है। इतना ही नहीं चाइल्ड वेलफेयर कमेटी को भी इस बात की जानकारी नहीं है।
12 और 10 वर्ष के दो सगे भाईयों की मां 34 वर्षीय रुकसार 22 नवंबर को खाना बनाते समय रेवाड़ी में झुलस गई थी। उसे पीजीआई दाखिल कराया गया। कोई सहारा न होने और अस्पताल के माहौल में मां की हालत देख इन बच्चों की भी हालत बिगड़ी तो अस्पताल प्रशासन ने एक बेड पर इन बच्चों को भी भर्ती कर लिया। पीजीआई के डॉ. आलोक खन्ना बच्चों का इलाज कर रहे हैं। 10 वर्षीय बच्चे के बेहोश होने पर उसे ड्रिप भी चढ़ाई गई। फिलहाल इन बच्चों को जो कोई कुछ खाने को दे देता है तो वह खा लेते हैं। जेजेपी के शहरी हलका अध्यक्ष राजेश सैनी भी रुकसार के इलाज के साथ बच्चों की मदद में जुटे हैं। साथ ही वे एसडीएम राकेश कुमार से बच्चों के भविष्य को देखते हुए उन्हें संरक्षण देने की मांग कर चुके हैं। उधर, दूसरे दिन भी प्रशासन ने बच्चों को संरक्षण देने के मामले में कोई कार्रवाई तक शुरू नहीं की है। यह बात दीगर है कि अभी तक इन बच्चों को यह तक नहीं बताया गया है कि उनकी मां की मौत हो चुकी है। मां की मौत के बाद बच्चे हर किसी से मम्मी के ठीक होने की बात पूछ रहे हैं। वहीं हर कोई बच्चों के इस सवाल से अनुत्तरित हैं।
महिला के हुए थे मजिस्ट्रेटी बयान
रेवाड़ी से रेफर कर पीजीआई रोहतक भेजी गई रुकसार ने ज्युडिशियल मजिस्ट्रेट पुल्वी ओझा को दिए बयान में महिला ने खुद को खाना बनाते समय जल जाना बताया था।
क्या है मामला
पीजीआई में भर्ती 12 वर्षीय बच्चा बताता है कि वह लोग उत्तर प्रदेश के जनपद बरेली के थाना कैंट क्षेत्र के मोहल्ला ठिरिया निजावत खान के वार्ड नंबर तीन का निवासी हैं। चार महीने पहले उनके पिता नाजिम खान की मौत हो गई थी। उसके पिता मजदूरी करते थे और वह दोनों भाई पढ़ाई करते थे। पिता की मौत के बाद मां को किसी ने रेवाड़ी में काम मिलने की सलाह दी। मां उन दोनों को यह कहकर लाई कि वह काम करेगी और उन दोनों को खूब पढ़ाएगी। रेवाड़ी में वह लोग भीम सिंह के साथ रहने लगे और मजदूरी करने लगे। 22 नवंबर को खाने बनाते समय मां झुलस गई।
गरीब जानकर दिया सहारा
राज मिस्त्री भीम सिंह बताते हैं कि चार महीने पहले रेवाड़ी की बाजार में रुकसार और उनके बच्चों को देखा। रुकसार के हाथ में बक्सा और उसे रोते देख जानकारी करने लगा। इस पर वह बताने लगी कि उनका इस दुनिया में कोई नहीं है। इस पर भीम सिंह उसे अपने साथ कमरे पर ले आया। तबसे यह तीनों उसके साथ रहते थे। बकौल भीम सिंह, 22 नवंबर को वह नहाने गया। इसी बीच खाना बनाने के दौरान आग भड़कने से रुकसार काफी जल गई तो वह उसे लेकर पहले स्थानीय अस्पताल गया, जहां से उसे पीजीआई रेफर कर दिया गया। उसने उसके इलाज में कोई कमी नहीं छोड़ी।
एसडीएम बोले, अस्पताल प्रशासन से बात हुई है
एसडीएम राकेश कुमार का कहना है कि बच्चों के बारे में पीजीआई के डायरेक्टर से उनकी बात हुई है। डॉ. आलोक खन्ना बच्चों का इलाज कर रहे हैं। सोमवार तक बच्चों को लेने कोई नहीं आया तो उनके संरक्षण के लिए लिखित कार्रवाई की जाएगी। पीजीआई प्रशासन से पत्र मिलने के बाद चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के निर्णय के अनुसार बच्चों को संरक्षण दिया जाएगा।
रेवाड़ी पुलिस ने लिए बयान
रेवाड़ी पुलिस के उपनिरीक्षक रामनिवास ने पीजीआई पहुंचकर बच्चों का हाल जाना। बच्चों ने बताया कि अब उनकी तबीयत ठीक है। उन्होंने बच्चों से कहा कि वह परेशान न हों, सब ठीक हो जाएगा। इसके बाद उन्होंने महिला को भर्ती कराने वाले राज मिस्त्री भीम सिंह के डॉक्टर कक्ष में बयान लिए।
चाइल्ड वेलफेयर कमेटी को खबर तक नहीं
चाइल्ड वेलफेयर कमेटी की चेयरपर्सन आशा आहुजा का कहना है कि कमेटी के समक्ष अभी तक ऐसे मासूमों के बारे में कोई सूचना नहीं है। नियमानुसार संबंधित पुलिस को इसकी जानकारी देनी चाहिए। फिलहाल वह मामले का पता करवाएंगी और बच्चों को हर हाल में संरक्षण दिलाया जाएगा।
क्या है बाल संरक्षण अधिनियम
बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम 2005 से लागू है। इसके अंतर्गत बच्चों के संरक्षण के लिए त्वरित विचारण के लिए न्यायालयों का गठन किया गया है। इसके लिए जिला स्तर पर चाइल्ड वेलफेयर कमेटी का गठन किया गया है। किसी भी लावारिस बच्चे के मिलने पर उसके तत्काल संरक्षण की व्यवस्था का दायित्व कमेटी का है। कमेटी अपने नियंत्रण वाले बाल गृहों में बच्चों को संरक्षण दिलाती है। किसी भी लावारिस बच्चे के मिलने अथवा भर्ती होने के तत्काल बाद उसे संरक्षण दिलाने का प्रावधान है।